ताज़ा गीत- love Story

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4.11.13

अदा के जेवर भी, कातिलाना तेवर भी

“मैं तेरे लिए कुछ ज्यादा ही सेक्सी हूँ....” कुछ ऐसे ही तीखे अंदाज़ से वो न्योता देती है अपने माशूक को, मुँह से नुकीली गालियाँ निकालते समय उसकी जुबान बिलकुल भी नहीं लडखडाती, वो मर्द की मात्र परछाई भर नहीं बल्कि उसके टक्कर में खड़ी एक चुनौती है जो किसी भी मोड पर अपने फायदे के लिए उसे पटखनी देने से भी नहीं चूकती. कुछ ऐसी ही है आज के बॉलीवुड में तारिकाओं के लिए लिखे जा रहे किरदार. कहीं न कहीं आज का पुरुष भी अपने समक्ष इस नई ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरी ‘आधी आबादी’ की उपस्तिथि को स्वीकार कर चुका है. तभी इन बोल्ड किरदारों को बेहद सहज स्वीकृति भी प्राप्त हो रही है. 

 ९० के दशक में बनी एक सफल फिल्म थी दामिनी, जिसमें नायिका सच का साथ देते हुए अपने अपनों के खिलाफ एक मुश्किल जंग लड़ती है जहाँ उसे साथ मिलता है गोविन्द नाम के एक वकील का. फिल्म में नायिका दामिनी का किरदार सशक्त तो था पर ऐसा लगा कि अभी भी नायिका नायक पर कुछ निर्भर सी है. अब आज के दौर पर आते हैं, फिल्म नो वन किल्ल्ड जसिका में जसिका की मदद के लिए सामने आती है बेबाक और निर्भीक मीरा. मीरा के किरदार को रानी मुखर्जी ने उसी सशक्तता से परदे पर साकार किया जिस खूबी से गोविन्द को सन्नी देओल ने किया था. 

  
बोल्ड किरदारों से भी परहेज नहीं
 ८० के दौर में सी ग्रेड फिल्मों में ग्लैमरस भूमिकाओं में नज़र आई सिल्क स्मिता का जीवन शायद बहुत आनंद भरा नहीं था, पर जब विध्या बालन उनके जीवन से प्रेरित फिल्म द डर्टी पिक्चर में सिल्क स्मिता के रोल में परदे पर अवतरित हुई तो उनके किरदारीकरण में कहीं कोई असहजता, कहीं कोई संशय नहीं बल्कि जीवन के प्रति पूर्ण स्वीकृति और सहजता नज़र आती है. वो अपनी चुनी हुई राहों को लेकर शर्मिंदा बिलकुल भी नहीं है, बल्कि कहीं कहीं उनकी रहस्यमयी मुस्कान में मर्दों की सबसे बड़ी कमजोरी का उपहास भी झलकता दिखा. 

 मोहन सिक्का की कहानी द रेलवे आंटी पर आधारित और अजय बहल निर्देशित फिल्म बी ए पास में रेलवे आंटी सारिका की बोल्ड भूमिका में शिल्पा शुक्ला बेहद अन्तरंग दृश्यों में भी कहीं असहज नहीं प्रतीत होती. इससे पहले शिल्पा चक दे इंडिया में भी अपने अभिनय का सिक्का जमा चुकी है. उधर रेलवे आंटी की भूमिका के लिए निर्देशक की पहली पसंद रही रिचा चढ्ढा ने पुरुष प्रधान अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में नगमा के किरदार में अपनी ऐसी छाप छोड़ी जिसे दर्शक लंबे समय तक याद रखेंगें. तिग्मांशु धुलिया की साहेब बीवी और गैंगस्टर भले ही गुरुदत्त -मीना कुमारी की साहेब बीवी और गुलाम से प्रेरित हो पर यहाँ बीबी बनी माहीं गिल उस दौर की छोटी बहु से मीलों अलग है. 

कभी नायिका कभी खलनायिका 
नए दौर की ये सुंदरियाँ परदे पर बस एक वास्तविक औरत दिखना चाहती हैं. न देवी न पतिता, बल्कि एक स्त्री मात्र जो सुविधानुसार अच्छी या बुरी हो सकती है. वो नायिका –खलनायिका के तय मापदंडों से इतर नज़र आती है. वो बेड़ियों से मुक्त, आज़ाद ख्याल और नए समाज के मूल्यों के प्रति पूरी तरह वाकिफ और सजग दिखाई देती है. पर फिर भी ये परिवर्तन अभी अपनी आरंभिक प्रक्रिया में ही है. फिल्म बोम्बे टौकीस में नायिका को अपने सहकर्मी के समलिंगी होने को लेकर तनिक भी अचंभा नहीं होता, हाँ मगर अपने पति का उसी समलिंगी सहकर्मी के प्रति आकर्षण वो बर्दाश्त नहीं कर पाती. इसी तरह फिल्म रोक्क्स्टार में नायिका नायक से ठर्रा पीने और ‘गंदे मंदे’ लोगों के बीच बैठ ‘जंगली जवानी’ देखने के अपने ‘रहस्य विकारों’ का खुलासा तो बेबाकी से करती है पर शादी से पहले ‘चुम्बन’ को लेकर असमंजस में है. ओढ़े हुए संस्कार और अपने मूल स्वभाव का यही अंतरद्वंद ही आखिर उसके लिए घातक साबित होता है. 

 मात्र नाच गाना या फिल्म को जरूरी ग्लैमर देना ही नहीं आज की नायिकाएं पुरुष प्रधान कहानियों में भी अपने किरदार को बेहद सशक्त रूप से पेश कर रहीं हैं. यहाँ तक कि उन्हें बिना मेकअप परदे पर दिखने से भी परहेज नहीं है. फिल्म तलाश में नायक और नायिका अपने एकलौते बेटे की अकाल मृत्यु के दुःख से झूझ रहे हैं, यहाँ नायक को लगता है कि नायिका कमजोर है और उसे इलाज़ की आवश्यकता है वहीँ वास्तविकता इसके बिलकुल उलट होती है. फिल्म में दिखाया गया है कि जहाँ नायक अपने अवसादों में गहराता जाता है वहीँ नायिका अपने दुःख को सामना अधिक बहादुरी और मानसिक परिपक्वता से करती है. 

 फिल्म राँझना में नायिका अपने फैसलों पर अडिग रहती है. अक्सर जहाँ गुजरे दौर की फिल्मों में अपने लिए जान देने को तैयार प्रेमी को अपनाने में नायिका तनिक भी समय नहीं गंवाती थी वहीँ यहाँ वो न सिर्फ अपने बचपन के प्रेमी को स्वीकार करने से इनकार करती है वरन उसे समझा भी देती है कि वो ऐसे क्यों कर रही है. अबला नहीं सबला मधुर भंडारकर निर्देशित फैशन हो या हिरोइन, नायिकाएं यहाँ अपने अस्तित्व को बचाए रखने के खातिर किसी भी हद तक जाने से नहीं झिझकती. वो मर्दों की दुनिया में कहीं अलग थलग नहीं पड़ती बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ उनकी आँखों में ऑंखें डाल अपने वजूद की उपस्तिथि दर्ज कराती नज़र आती है. जहाँ फिल्म कहानी में नायिका अपने पति की मौत का बदला लेने के लिए गर्भवती महिला का रूप धारण करती है वहीँ राज ३ की नायिका अपने ढलते कैरियर को बचाने के लिए काले जादू का सहारा लेती है. 

 इश्किया की विध्या बालन हो, या फिर तारा की रेखा राणा, मटरू की बिजली का मंडोला की शबाना हो या औरेंगजेब की अमृता सिंह, एक थी डायन की हुमा हो या फिर अइय्या की रानी मुखर्जी, कोकटेल की दीपिका पादुकोन हो या फिर जिस्म २ की सनी लियोनि, आज की नायिकाएं हर चुनौती के लिए एकदम तैयार नज़र आती हैं. वो अपने लिए बेहतर भूमिकाएं चाहती है और ऐसे किरदार जिनके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाए.

  दर्शक इंतज़ार कर सकते हैं – 
 रज्जो का, जहाँ कंगना रानौत एक बाजारू स्त्री की भूमिका में दिखेंगीं, कंगना इस किरदार को अपने दिल के बेहद करीब मानती हैं. वैसे इस फिल्म से पहले ही दर्शक उन्हें क्रिश ३ में एक नितांत नकारात्मक भूमिका में देखेंगें. 




 डेढ़ इश्किया का, जहाँ वापसी करेंगीं माधुरी दीक्षित नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी के साथ. फिल्म अपने पहले संस्करण की ही तरह काफी बोल्ड होगी ऐसी उम्मीद है. 


रागिनी एम् एम् एस २ का, जहाँ बालाजी फिल्म्स ने सन्नी लिओनि को १ करोड रूपए के पारिश्रमिक पर फिल्म से जोड़ा है. भारतीय मूल की सन्नी हॉलीवुड की सबसे मशहूर पोर्न स्टार्स में से एक है.






इनका मानना है... 

 महेश भट्ट – “मेरी फिल्मों में हमेशा ही स्त्री किरदार अपनी किस्मत की राहें खुद चुनती आई हैं. आज की नारी अपना जीवन बिना पुरुष पर निर्भर हुए भी गरिमा के साथ जीने में सक्षम है. मेरी फ़िल्में इसी नारी को चित्रित करती है” 


 एकता कपूर – “सेक्स अब कोई वर्जित चीज़ नहीं रह गयी है. मेरी फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ आज के समाज का आईना है” 


 किरण राव – “मैं नारी प्रधान फिल्मों में विश्वास नहीं रखती, बल्कि मानती हूँ कि हमारी फिल्मों में अभिनेत्रियों को चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं दी जानी चाहिए. मैं अपनी फिल्मों में में स्त्री के बहुरंगी रूप साकार करना चाहूंगी.”

5.10.13

गीत कभी बूढ़े नहीं होते - अहा जिंदगी से प्रकाशित आलेख

अगर साज़ छेड़ा तराने बनेगें,
तराने बनेगें...तराने बनेगें...तराने बनें तो..
तराने बनें तो फ़साने बनेगें....

जी हाँ कुछ ऐसा ही है हिंदी फिल्मों का किस्सा भी. यहाँ बिना तरानों के कोई भी फ़साना पूरा नहीं होता. नायक नायिका को छेड़ना चाहे तो गा उठता है, ओ लाल दुप्पट्टे वाली तेरा नाम तो बता....अगर नायिका के रूप श्रृंगार की तारीफ़ करना चाहे तो धीमे स्वरों में गुनगुना उठेगा चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो, नायिका का विवाह किसी और से हो रहा है तो वहाँ उस मुबारक मौके पर नायक का आना और गाना आवश्यक हो जाता है, कभी उसके जुबाँ से बद्दुआ निकलती है तो कभी महानता का परिचय देकर वो दुआओं की बरसात करता हैं मगर नशे की हालात में भी मजाल है कि उसका कोई एक सुर भी इधर से उधर हो जाए. अब यहाँ नायक का गायक होना कतई जरूरी नहीं है, वो गाँव का एक साधारण तांगे वाला हो सकता है (दिलीप कुमार फिल्म नया दौर में), कोई मल्लाह (सुनील दत्त मिलन में), स्कूल का अध्यापक (विनोद खन्ना फिल्म इम्तेहान में) या फिर कोई कार मेकेनिक (राजेश खन्ना फिल्म अवतार में) भी, पर उसका सधे हुए गले से यूहीं अचानक गा उठना, थियेटर के परदे पर आँखें गडाये बैठे दर्शकों को कभी नहीं खटकता. सीधी साधी घरेलु नायिका हो या किसी डांस क्लब में थिरकती वैम्प, या फिर कोई भटकती आत्मा ही क्यों न हो, आवाज़ में यहाँ भी वही सुरीली नशीली कशिश. गाना शुरू होता है तो नायक नायिका को सहयोग देने और साथ में नाचने के लिए भी एक समूह जाने कहाँ से आ धमकता है, और ये भी हमें कभी नहीं खलता. कभी कोई ये सवाल नहीं पूछता कि जब नायक और नायिका अपने व्यक्तिगत जज्बों का बयाँ कर रहे हैं तो आखिर ये थिरकती बालाएं क्यों आकर उनके प्रेम में खलल डाल रहीं हैं, क्या ये सब तैयार बैठी होती हैं कि कब नायक नायिका गाना शुरू करें और कब उन्हें कदम थिरकाने का अवसर मिले ? नहीं, हम ये सब कभी नहीं पूछते. दोस्तों यही तो जादू है फिल्म संगीत का, कि सब कुछ इतना अव्यवहारिक होने पर भी हमें कुछ अजीब नहीं लगता बल्कि कभी कभी तो हम सिर्फ इन गीतों को परदे पर देखने के लिए ही पूरी फिल्म को बर्दाश्त कर लेते हैं. फिल्म संगीत का ये खुमार ८२ साल पहले बनी, पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ से सिने प्रेमियों के सर चढा था और आज आठ दशकों के बाद भी इसका सुरूर हमें उतना ही लुभा रहा है.

सारे सवाल, सारे तर्क एक तरफ रख दीजिए क्योंकि सच्चाई यही है कि भारतीय फ़िल्में बिना गीत संगीत के अधूरी थी, अधूरी हैं और अधूरी रहेंगीं. दुनिया की तमाम भाषाओं में जो फ़िल्में बनती है उनमें संगीत सिर्फ पार्श्व में रहकर परदे पर चल रहे दृश्य के भाव को सूक्ष्मता देने का काम करता है, पर हमारी भारतीय फिल्मों में संगीत का महत्त्व बहुत व्यापक है, यहाँ तो हम गीत संगीत को फिल्म की जान तक कह सकते है. पार्श्व संगीत के अलावा फिल्म के गानों का भी जिम्मा एक या एक से अधिक संगीतकार उठाते हैं. फिल्म का निर्देशक, लेखक या लेखकों की टीम के साथ मिलकर कहानी की पठकथा में गीतों की सिचुएशन (जरुरत) पैदा करते हैं. फिर गीतकार और संगीतकार मिलकर इन सिचुएशनों पर गीत तैयार करते हैं, जिन्हें पार्श्व गायक अपने सुरीले स्वरों से संवारते हैं. फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही ये गीत दर्शकों के सामने परोसे जाते हैं, दरअसल ये गीत ही फिल्म के प्रचार के अहम घटक होते हैं. गीत अगर कामियाब हो जायें तो फिल्म की आधी सफलता सुनिश्चित मान ली जाती है (हालाँकि ऐसा हो जाए ये जरूरी नहीं है). यहाँ बात सिर्फ हिंदी सिनेमा की नहीं वरन ये चलन तमाम भारतीय भाषाओं में एक सामान दिखाई देता है, जिससे एक बात तो साफ़ जाहिर हो जाती है कि अनेकों अनेक विविधताओं के बावजूद फिल्मों में, फ़िल्मी गीतों की जरुरत को लेकर देश भर के सिनेमाकार एकमत हैं. और क्यों न हो, आखिर हम भारतियों का जीवन भी तो हर पड़ाव पर संगीत से जुड़ा है, जन्म, मरण, या विवाह हो, प्रेम हो या विरह, हर मौके के लिए गीत हैं हमारे पास. ऐसे में बिन गीतों के कैसे अपनी कल्पना को सिनेमा का सांचा दे, इस मिटटी से जुड़े फिल्मकार.   

अमूमन हर भारतीय फिल्मों में औसतन ६ से १० गीत तक होते हैं, कुछ में अधिक तो कुछ में कम. आम तौर पर ये गीत फिल्म की कहानी का ही हिस्सा होते हैं, पर कभी कभी इन्हें माहौल को हल्का फुल्का बनाने या कहें ‘राहत’ देने के लिए भी डाला जाता रहा हैं, जिसके खत्म होने पर कहानी वापस अपने ढर्रे पर आ जाती है. नब्बे प्रतिशत गीत नायक या नायिका पर फिल्माए जाते हैं. कुछ चरित्र अभिनेताओं पर, तो कुछ हास्य अभिनेताओं पर, कुछ खलनायक के इर्द गिर्द घूमती उसकी खास खलनायिकाओं पर भी  केंदित होते हैं. एक ज़माने में अभिनेत्री हेलेन को इस काम में महारथ हासिल थी, आज के दौर में इन गीतों को ‘आईटम’ गीत कहा जाता है और इसे किसी खास देसी विदेशी मॉडल या अभिनेत्री पर फिल्माया जाता है जिसका जमकर प्रचार किया जाता है. आजकल इन आईटम गीतों की सफलता पर भी पूरी फिल्म का भविष्य दाँव पर लगा रहता है. फिल्म की एल्बम (एक फिल्म के सभी गीतों का संकलन) को फिल्म के मूड और कलेवर के हिसाब से तैयार किया जाता है.

विदेशों में ऐसी फ़िल्में जिनमें किरदार बात करते करते गाने लगे उन्हें ‘म्यूजिकल’ कहा जाता है (उदाहरण -साउंड ऑफ म्युज़िक, द डर्टी डांसिंग आदि), उस हिसाब से तो लगभग हर भारतीय फिल्म म्यूजिकल ही कही जायेगी. शुरू के दौर में अभिनेता ही खुद अपने गीत गाते थे, कुंदन लाल सहगल, सुरैय्या, के सी डे, आदि आरंभिक दौर के गायक सितारे हुए करते थे, १९३५ में फिल्म धूप छांव से प्लेबैक गायन का चलन आरंभ हुआ, जो आज भी बदस्तूर जारी है. हालाँकि इनमें से कुछ गीत फिल्म के पार्श्व में किरदार के मन के भावों को अभिव्यक्त करने वाले होते हैं पर अधिकतर गीत हमारी फिल्मों में ऐसे ही हैं जिन्हें फिल्म के कलाकार खुद ही परदे पर गाते हुए या कहें कि पार्श्व गायक के स्वर तरंगों से, अपने लबों की जुम्बिश को जोड़ते नज़र आते हैं. फिल्म के किरदार, कहानी और व्यावसायिक सोच के आधार पर ये तय होता है कि फिल्म के गीत किस प्रकार के होंगें   .

यदि फिल्म का नायक कवि या लेखक है तो गीतों में भी कुछ साहित्यिक गहराई मिलेगी, जैसे फिल्म प्यासा में गुरुदत्त के और फिल्म कभी कभी में अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गीत (ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..., जाने वो कैसे लोग थे..., जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है..., मैं पल दो पल का शायर हूँ....आदि), फिल्म के प्रमुख किरदारों में से कोई अगर गायक या किसी रोक्क् समूह से जुड़ा हुआ किरदार हो तो फिल्म काफी हद तक संगीतमय हो जाती है, ऐसी फिल्मों से अच्छे संगीत की उम्मीद लाजमी ही है जैसे फिल्म क़र्ज़ में ऋषि कपूर, अभिमान में अमिताभ और जया बच्चन और ताजा उदाहरणों में रोक्क् ऑन के फरहान अख्तर या रोक्क् स्टार के  रणबीर कपूर का किरदार. नृत्य कला से जुड़े नायक नायिका पर केंद्रित फिल्मों में ये भी देखना आवश्यक है कि वो किस प्रकार के नृत्य से जुड़े है, सुधा चंद्रन नाचे मयूरी में एक भारतीय नृत्यांगना बनी थी तो मिथुन चक्रवर्ती डिस्को डांसर में फिल्म के शीर्षक अनुरूप डिस्को डांसर ही बने हैं, जाहिर इन दोनों फिल्मों के संगीत में भी ज़मीन आसमान का फर्क दिखेगा. अमूमन प्रेम कहानियों का संगीत मधुर, सुरीला और ताजगी से भरपूर रहा करता है, बानगी देखें -मुझे कुछ कहना है (बोब्बी), देखो मैंने देखा है ये एक सपना (लव स्टोरी), हम बने तुम बने, सोलह बरस की बाली उमर को सलाम (एक दूजे के लिए), ए मेरे हमसफ़र (क़यामत से क़यामत तक) आदि. कुछ गीत नायक या नायिका का परिचय बताते हैं जैसे मैं जहाँ चला जाऊं (बनफूल), मेरा नाम है चमेली (रजा और रंक), मैं राही अनजान राहों का (अनजाना), मेरा नाम है शबनम (कटी पतंग) आदि, तो कुछ गीत नायक और नायिका के पेशे से जुड़े होते हैं जैसे राहों में रहते हैं, मैं निकला गड्डी लेके (ट्रक चालक), सर जो तेरा चकराए (चम्पी वाला), आहें न भर ठंडी ठंडी (चाय वाली), मर्द तांगेवाला (तांगेवाला), सारी दुनिया का बोझ (कुली) आदि. फिल्म होर्रर हो तो गीत भी हौन्टिंग हो जाते हैं जैसे झूम झूम ढलती रात, नैना बरसे रिमझिम रिमझिम, गुमनाम है कोई आदि. कुछ गीत हंसा हंसा कर लोटपोट करने वाले होते हैं, किशोर कुमार, महमूद, भगवान दादा, आई एस जौहर, असरानी, जॉनी वाकर जैसे अभिनेताओं का ख्याल आते ही जेहन को गुदगुदा जाते हैं ऐसे गीत – पांच रूपया बारह आना, एक चतुर नार बड़ी होशियार, हम थे वो थी और समां रंगीन, आना मेरी जान मेरी जान, भोली सूरत दिल के खोटे...बिरही गीतों की भी भरमार रही है हमारी फिल्मों में -चांदी की दीवार न तोड़ी, हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, वफ़ा जिनसे की बेवफा हो गए, न आदमी का कोई भरोसा, तेरी याद दिल से जैसे ढेरों दर्द भरे गीत आज भी हमें रुलाने की कुव्वत रखते हैं. इसके अलावा मुजरे (चलते चलते यूहीं कोई मिल गया था, इन आँखों की मस्ती के, हुज़ूर आते आते बहुत देर कर दी), कव्वालियां (ये इश्क इश्क है, तेरी महफ़िल में किस्मत आजमाकर, अल्लाह ये अदा, तुमसे मिलके दिल का), बच्चों के गीत (नानी तेरी मोरनी को, मास्टरजी की आ गयी चिट्टी, लकड़ी की काठी, इचक दाना), ग़ज़ल (तुमको देखा तो ये ख़याल आये, सीने में जलन, जिन्दा हूँ इस तरह, यूँ हसरतों के दाग), लोरियाँ (आजा री निंदिया आ, सुरमई अखियों में, चांदनिया), देशभक्ति गीत (मेरे देश की धरती, ये देश है वीर जवानों का, हर करम अपना करेंगें), नायिका की तारीफ करते गीत (चन्दन सा बदन, बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा, अब क्या मिसाल दूं), कैबरे गीत (आओ हुज़ूर तुमको, ये है रेशमी जुल्फों का अँधेरा, हुस्न के लाखों रंग), मिटटी से जुड़े लोक अंदाज़ के गीत (पान खाए सैयां हमारे, चढ गयो पापी बिछुआ, झुमका गिरा रे, मुन्नी बदनाम हुई), भजन (न मैं धन चाहूँ, सुख के सब साथी, अल्लाह तेरो नाम, ओ पालनहारे), प्रेरणा से भरे गीत (रुक जाना नहीं, गाडी बुला रही है, बावरा मन देखने चला एक सपना) या फिर कुछ दार्शनिक रंग में रंगे गीत (ताल मिले नदी के जल में, सजन रे झूठ मत बोलो, तुझको चलना होगा आदि) भी हमारी फिल्मों का हिस्सा रहे हैं.         

फ़िल्मी गीतों की कामियाबी में उनके फिल्मांकन का भी बड़ा हाथ रहा है, दशक दर दशक फिल्मांकन के नए नए प्रयोगों ने इस गीतों के प्रति दर्शकों की दिलचस्पी कायम रखी है. ५० और ६० के दशक को संगीत के लिहाज से भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा जाता है. इस दौर ने सिनेमा को बिमल रॉय, गुरुदत्त, व्ही शांताराम, महबूब खान, राज कपूर, जैसे महान फिल्मकार दिये. इसी दौर में सी रामचंद्र, शंकर जयकिशन, एस डी बर्मन, नौशाद, ओ पी नैय्यर, मदन मोहन, हेमंत कुमार, रवि जैसे संगीतकार हुए और शैलेन्द्र, साहिर, हसरत, शकील जैसे जबरदस्त गीतकारों ने इस स्वर्णिम युग के सबसे यादगार गीतों को रचा. बेशक इन महान फिल्मकारों की भी प्रेरणा होलीवुड के सफलतम फिल्मकार रहे पर इनमें से किसी ने भी भारतीय जनमानस की कहानियों को परदे पर साकार करते हुए कभी भी गीत संगीत से परहेज नहीं रखा, बल्कि अपनी फिल्मों में उन्हें इतनी खूबसूरती से पिरोया कि विदेशी फिल्मकार भी चकित रह गए. हाँ अंदाज़ सबका जुदा और अनूठा रहा. गुरुदत्त की फिल्मों के अधिकतर गीत सीधे गायक की आवाज़ से उठा करते थे यानी उनमें प्रिल्यूड (गीत के आरंभिक संगीत स्वर) का इस्तेमाल न्यूनतम होता था, कारण साफ़ था, गुरु संवादों को गीतों में रूपांतरित करते हुए स्वाभाविकता को बरकरार रखना चाहते थे. वो गीतों के उत्कृष्ट फिल्मांकन के लिए भी जाने जाते थे. फिल्म ‘कागज़ के फूल’ का गीत वक्त ने किया क्या हसीं सितम को अपने लाजवाब लाईटिंग और अनूठे कैमरा कोणों के लिए आज भी याद किया जाता है. दूसरी तरफ राज कपूर, फिल्म के गीतों को बेहद मुक्तलिफ़ रंगों से सजाने में विश्वास रखते थे. फिल्म ‘आवारा’ का घर आया मेरा परदेसी गीत को ही लें. इस एक गीत में ही पूरी फिल्म का खाका है, जिसे निर्देशक ने बेहद कलात्मक ढंग से उभरा है. इसी फिल्म के दम भर जो उधर मुँह फेरे में नायक नायिका का अंतरद्वंद देखते ही बनता है. फिल्म ‘श्री ४२०’ के प्यार हुआ इकरार हुआ को आज भी हर प्रेमी दिल बरबस ही गुनगुना उठता है.

महबूब खान की मास्टरपीस ‘मदर इंडिया’ में अपने पति को खोकर, तमाम दुःख उठाकर बच्चों का पालन पोषण करती नायिका जब हल कांधे पर उठाकर गाती है कि दुनिया में हम आये हैं जीना ही पड़ेगा तो पत्थर से पत्थर दिल भी पसीज कर रह जाता होगा. वहीँ जब शहंशाह अकबर के दरबार में कनीज अनारकली खुलकर ऐलान करती है कि प्यार किया कोई चोरी नहीं की तो सामने बैठे दर्शक भी अपने मन में कहीं एक अजीब से आत्मविश्वास का संचार अनुभव करते होंगें. बिमल रॉय की अनमोल कृति ‘बंदनी’ का अंत एक ऐसे गीत से होता है जहाँ नायिका के मन के भाव दर्शकों की आँखों से छलक पड़ते हैं जब बर्मन दा के स्वर गूंजते हैं कि मुझे आज की विदा का मर के भी रहता इंतज़ार. यही कमाल बिमल दा, फिल्म ‘सीमा’ में भी करते हैं जहाँ गायक थे मुकेश और गीत था- ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना. ऐसा नहीं है कि केवल प्रमुख धारा की फिल्मों में गीत संगीत को जगह मिली हो, ‘दो बीघा जमीन’ को हम एक बॉलीवुड मसाला फिल्म नहीं कह सकते, मगर यहाँ भी बिमल दा ने गीतों की जगह बनायीं मौसम बीता जाए गीत को और उसके फिल्मांकन को भला कोई कैसे भूल सकता है. राज कपूर की ‘जागते रहो’ और ‘बूट पोलिश’ जैसी सामानांतर फिल्मों में भी फिल्म के चरित्र अनुरूप गीत रखे गए.

यही दौर था जब इंडस्ट्री में रफ़ी साहब, किशोर कुमार, मुकेश, लता मंगेशकर, मन्ना डे, तलत महमूद, आशा भोसले जैसे गायकों ने पार्श्वगायन को अद्भुत ऊंचाईयां दी. गीत संगीत फिल्मों में इतना अहम स्थान रखते थे कि उस दौर के सभी बड़े सितारे अपनी आवाज़ और अदायगी को सर्वश्रेष्ठ रूप से निभाने वाले गायकों से ही अपने गीत गवाते थे. मुकेश की आवाज़ को राज कपूर अपनी आत्मा कहते थे तो रफ़ी साहब की आवाज़ में दिलीप कुमार की अदायगी कुछ और निखर कर सामने आती थी. किशोर कुमार देव आनंद के अंदाज़ को स्वरों में संवारने में सबसे सटीक साबित हुए, बाद में वो राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे सुपर स्टारों की भी आवाज़ बने. जहाँ नायिकाओं के लिए लता मंगेशकर पार्श्वगायन करती रही वहीँ अधिकतर सह अभिनेत्रियों और वैम्पों के गीत आशा के हिस्से में आये. मन्ना डे की बेस भरी आवाज़ नायकों पर अधिक नहीं जमती थी तो उनके हिस्से चरित्र अभिनेताओं और हास्य अभिनेताओं के गीत आये. हालाँकि कुछ अभिनेताओं ने भी यदा कदा गायिकी में सुर आजमाए पर ये मूलतः एक विविधता उत्पन्न करने के लिए किया गया प्रयोग भर ही रहा. हाँ मगर गौर तलब है कि जब भी किसी बड़े सितारे ने फिल्मों में पार्श्वगायन किया, उस गीत विशेष को आपार लोकप्रियता भी नसीब हुई.     

७० का दशक नई ऊर्जा का रहा, जहाँ लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर डी बर्मन (पंचम), और कल्याणजी आनंदजी की जोडियाँ शीर्ष पर रहीं. गीतकारों में आनंद बक्शी और मजरूह सुल्तानपुरी का सिक्का जम कर चला. कुछ दृश्य कभी भूले नहीं जा सकते. हूगली नदी पर, हावरा ब्रिज के ठीक नीचे एक कश्ती में अपना दर्द एक तवायफ को सुनता नायक कहता है या कहें कि गाता है कि गैरों का दोष नहीं है ये किस्सा है अपनों का (अमर प्रेम), एक सर्द तूफानी रात में गर्म अलाव के करीब पिघलते दो जिस्म थरथराते होंठों से गुनगुनाते हैं कि भूल कोई हमसे न हो जाए (आराधना), भिखारियों के भेष में नायक को ढूंढते उसके साथी खुली सड़क पर गाते हुए चलते है कि सुबह से हो गयी शाम तुझको अल्लाह रखे (आँखें), पति और पहले प्यार के बीच उलझी नायिका गाते हुए कराह उठती है कि हम यादों के फूल चढाये और आंसू के दीप जलाये (दिल एक मंदिर), अपने मूक बधिर बेटे के इलाज के लिए पैसे जुटाने को सघर्ष करता एक पिता खुद को हौंसला देने के लिए गा उठता है जो जीवन से हार मानता उसकी हो गयी छुट्टी (शोर), नायिका या कहें प्रेतात्मा, अपने प्रेमी का सानिध्य पाकर उससे गुहार करती है इस अलाप के साथ कि लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो (वो कौन थी), और जाने ऐसे कितने कितने गीत भुलाए नहीं भूलते. इस दौर में मनोज कुमार, जे ओमप्रकाश, शक्ति सामंता और हृषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशकों ने अपने अपने निराले अंदाज़ में इन गीतों को अंजाम दिया.

इस दशक तक आते आते मगर फिल्म की एल्बम को अधिक व्यावसायिक तरीके से रचा जाने लगा था, उदाहरण के लिए अगर हम ‘मदर इंडिया’ को देखें तो उसमें हर गीत फिल्म की मूल कहानी की ही दिशा में बहता नज़र आता है, वहीँ अगर हम ७० के दशक की सफलतम फिल्म ‘शोले’ के संगीत एल्बम पर गौर करें तो पायेंगें कि यहाँ गीत फिल्म की मूल कहानी से जुड़े सहयोगी धाराओं को उजागर करने वाले हैं, जैसे ‘शोले’ में कुल ५ गीत थे, फिल्म में दो दोस्तों की दोस्ती कहानी का एक बड़ा आकर्षण था, तो इस दोस्ती को समर्पित एक गीत रखा गया, फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण फिल्म का खलनायक डाकू गब्बर सिंह का किरदार था तो उसके अड्डे के तिलस्म को उजागर करता हेलेन के तडके वाला एक गीत भी रखा गया. गाँव की पृष्ठभूमि को एक होली गीत के माध्यम से उजागर किया गया, तो नायक –नायिका के बीच की प्यार भरी नोंक झोंक को एक हलके फुल्के प्रेम गीत से संवारा गया. अंत में एक गीत नायिका के नृत्य कौशल को कैद करने के उद्देश्य से भी रखा गया. तो यहाँ एल्बम की योजना भी फिल्म की ही तरह काफी सोच विचार कर बनायीं जाने लगी थी.

८० के दशक में मार धाड़ वाली फिल्मों में संगीत पक्ष फीका पड़ने लगा, ये वो दौर था जब गैर फ़िल्मी संगीत जैसे पॉप और ग़ज़ल के एलबम्स तेज़ी से लोकप्रिय होते जा रहे थे. सामानांतर सिनेमा का एक नया चलन आया, जहाँ वास्तविक्ता को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा. जाहिर है इन फिल्मों में गीत संगीत की कोई गुंजाईश नहीं होती थी. कुछ समय के लिए लगा कि हिंदी फिल्मों से गीत संगीत का रिश्ता अब टूट जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ, नब्बे के दशक में फिल्म संगीत एक बार फिर नए साज़ साजिंदों के साथ लौट आया. पर इस वापसी में बहुत कुछ बदल चुका था. जहाँ ए आर रहमान, नदीम श्रवण, जतिन ललित जैसे युवा संगीतकारों ने संगीत रचने का तरीका ही बदल दिया वहीँ मणि रत्नम, सुभाष घई, यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, राकेश रोशन, राम गोपाल वर्मा, संजय लीला बंसाली और महेश भट्ट जैसे फिल्मकारों गीतों के फिल्माकन को एक अलग ही रूप दे डाला. जहाँ पहले नायक नायिका एक स्थान पर खड़े खड़े पूरा का पूरा गीत गा जाते थे, वहीँ अब गीतों का फिल्मांकन एक बेहद खर्चीला सौदा हो चला था. एक ही गीत में एक से अधिक लोकेशन, साज़ सज्जा और वेश भूषा में ढेरों बदलाव और नृत्य निर्देशक की उपस्तिथि ने गीतों के फिल्मांकन को कल्पनाओं का एक नया आकाश दे डाला था. आखिर जब गीत संगीत पर इतना सब निर्भर हो तो फिर उनके फिल्मांकन में कंजूसी क्यों हो भला...

वास्तव में देखा जाए तो फ़िल्मी गीत संगीत का दायरा सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं है. पीछे मुड़कर देखें तो जाने ऐसी कितनी फ़िल्में होंगीं जिन्हें आज की पीढ़ी केवल उनके अच्छे संगीत के लिए याद करती है. कितने गीत आज भी हमारे प्रिय होंगें पर हम उनकी फिल्मों के नाम भूल चुके होंगें. फिल्म लाख असफल और भुला देने लायक सही पर एक दो यादगार गीत आज भी उन फिल्मों को जिन्दा रखे हुए है. देखा जाए तो इन गीतों से जुडी हम सब की भी कितनी यादें हैं. हम अपने बचपन में सुने गीतों के प्रति अक्सर बेहद भावुक होते हैं, जवानी के दिनों में सबसे अधिक हमें रुमानियत से भरे गीत भाते हैं, आज चाहे कोई उन्हें कम अच्छा भी समझे तो क्या, कच्ची उम्र में जो गीत हमारे दिल से टकराए होंगे वो हमेशा ही हमें प्यारे रहेंगें. सच तो यही है कि हमारी यादों को जेहन के सही फोल्डर या कोष्ठ में सुरक्षित रखने में ये फ़िल्मी गीत हमेशा ही कारगर रहे हैं. यकीं न हो तो आप भी अपनी यादों को जरा टटोलिए, देखिये कितने गीत एक के बाद एक उन यादों को एक मुक्कमल तस्वीर में बदल देंगें.    


फ़िल्मी गीतों ने न सिर्फ फिल्मों को व्यावसायिक सफलता दिलाने में सहयोग किया है, बल्कि इन गीतों ने ढेरों फनकारों को रातों रात लोकप्रियता के शिखर पर भी बिठाया है.   आज के दौर में समय की गति बहुत तेज कदम है तो अगर फ़िल्म संगीत भी नए रंग ढंग में तेज़ी से बदल रहा है तो भला हैरत क्यों. इस नई सदी में हम, सब तरह के बदलावों के लिए खुल चुके हैं, जहाँ कोई ‘लगान’ जैसी फिल्म है जिसमें गीत संगीत की रूप रेखा क्लास्सिक हिंदी फिल्मों जैसा है तो ‘खोंसला का घोसला’ जैसी फिल्म भी हैं जहाँ गीत संगीत की गुंजाईश न के बराबर होने के बावजूद गीत रखे जाते हैं ताकि फिल्म को अच्छे से प्रचारित किया जा सके. मेलोडी की जगह रोक्क्, सूफी, और फ्यूज़न संगीत ने ले ली है, कल्ब मिक्स और महफ़िल मिक्स जैसे नए तकनीकी शब्द संगीत की शब्दावली में जुड चुके हैं. संगीत डिजिटल हो चला है, विश्व व्यापी हो चुका है, पर आज भी कहीं कहीं पारंपरिक राग माला या लोक गीतों की झलक हमारे गीतों में नज़र आ ही जाती है, ‘रेट्रो’ शब्द के परदे में हम कभी कभी अपने खोये अतीत को भी ढूँढने निकल पड़ते हैं. आज लगभग हर किस्म की फिल्म बन रही है और ढेरों नए फनकारों को जम कर मौका भी दिया जा रहा है. आज फिल्म संगीत का दबदबा इतना अधिक है कि गैर फ़िल्मी संगीत या तो खो सा गया है या फिर जो है वो भी प्रमुखधारा के फिल्म संगीत में घुल मिल गया है. खैर बदलाव तो आते रहें हैं और आते रहेंगें पर जब तक फिल्मों के प्रति हमारी दीवानगी रहेगी, फिल्म संगीत की लोकप्रियता शायद कभी कम नहीं होगी. फ़िल्मी गीतों ने हमारे मन के सभी भावों को शब्द दिये हैं, मस्त होके किसी धुन को गुनगुनाने की वजहें दी है. वो आवाजें दी है, जिनसे हमारी रातें रोशन हुई हैं, वो नज़ारे दिये हैं जिनसे हमारी यादें आज भी महकती हैं. श्रोताओं का ये बेइंतेहा प्यार, रचनाकारों को कुछ नया करने का जनून देगा और ये जूनून रह रह कर हमारे रचनाकारों को झकझोरेगा और कहेगा कि जो गीत नहीं जन्मा वो गीत बनायेगें...और ये सुरीला सिलसिला यूहीं चलता रहेगा.    

1.7.13

ज़िन्दगी, रिश्ते, प्यार और समाज की कहानियाँ दुहराते फिल्मों के गीतकार

पत्रिका  समसामयिक सृजन से प्रकाशित

एक कवि के लिए विचरने के लिए सारा आकाश रहता है। वह अपने लिए चुन सकता है कि उसे किस दिशा में अपनी कलम चलानी है। वह किसी भी रंग के शब्द अपनी कूची से रच सकता है, उसकी कविता उसका निजी साम्राज्य है। सोचिये, अगर शब्दों के इस सम्राट से कहा जाए कि जनाब, विषय हम आपको देंगें, आप बस उसी पर लिखिए, वैसे तो ये एक प्रेम गीत है पर फिर भी आपको इसमें कुछ “हट कर” लिखना होगा, मगर ध्यान रहे शब्द सरल होने चाहिए, जिसे कोई भी आम व्यक्ति आसानी से समझ सके, और रुकिए, हम एक धुन भी आपको देंगें, उसी धुन पर आपको शब्द बिठाने हैं, तो कितनी मुश्किल हो जाए कविराज के लिए। दोस्तों, हिन्दी सिनेमा में गीत लिखने की प्रक्रिया कुछ ऐसी ही है। यही वजह है कि अमूमन सभी बड़े साहित्यिक कवि (कुछ अपवादों को छोड़कर) फ़िल्मी गीत-लेखन से दूर ही रहे। ठीक वैसे ही जैसे शास्त्रीय संगीतकार फिल्म संगीतकारों से सदा अलग-थलग रहे या फिर जैसे रागों की घुमावदार गहराइयों को गले से नापने वाले नामी शास्त्रीय गायकों ने पार्श्वगायन में उतरने से हमेशा परहेज रखा।

बोलना शुरू करते ही हिन्दी फिल्मों ने गाना भी सीख लिया था। तकनीकी रूप से पश्चिम से प्रेरित होने के बावजूद हमारे आरम्भिक फिल्मकारों ने उनकी सीधी नक़ल नहीं की, वरन हमारी अपनी कहानियों को परदे पर उतारना शुरू किया, और यह भी कमाल देखिये कि बीते सौ वर्षों में (सवाक सिनेमा के ८० वर्षों में) किसी भी फिल्मकार ने बिना गीतों के कहानियों की कल्पना नहीं की, हाँ ऊँगली पर गिने जाने लायक कुछ प्रयोगात्मक फ़िल्में अवश्य हैं जिसमें कोई गीत नहीं था। ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य फिल्मों में गिने-चुने संगीत-अंश होते हैं। गीत-संगीत हमारी तहजीब, हमारे संस्कार हमारी बोल-चाल में इस कदर समाये हैं कि हम अपनी फिल्मों की तामीर इनके बिना मुक्कमल नहीं मान पाते। पहली बोलती फिल्म “आलम-आरा” के ‘दे दे खुदा के नाम पर...” से लेकर आज तक जाने कितने गीत बने। कभी इन गीतों ने हमें रुलाया तो कभी जख्मों पर मरहम रखा। कभी झूमने की वजह दी, तो कभी इश्क की गहराईयों को समझने में मदद दी, कभी तन्हाईयों में गुनगुनाने की फितरत दी, तो कभी महफ़िल में छा जाने की कैफियत.... फ़िल्मी गीतों ने किस-किस तरह से हमारा साथ नहीं दिया। इन गीतों में शब्द पिरोने वाले भी जाने कितने गीतकार आये और चले गए, मगर रोज ही जाने-अनजाने उनके शब्दों में हम ज़िन्दगी को और करीब से महसूस करते ही रहते हैं, तभी तो ये फ़िल्मी गीत हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक अहम हिस्सा थे, हैं और रहेंगें।

आरम्भिक दौर में जब फिल्म के अभिनेता–अभिनेत्री खुद ही अपना गायन करते थे और पार्श्वगायन की भी शुरुआत नहीं हुई थी, उस दौर के गीतकारों का अलग से नाम नहीं दिया जाता था। सम्भवतः फिल्म के संवाद लेखक या फिर खुद अभिनेता ही इन गीतों को लिख दिया करते थे। पार्श्वगायन की शुरुआत फिल्म “धूप छांव” से हुई जिसके गीतकार थे पण्डित सुदर्शन। ४० के दशक तक आते-आते फिल्मों में गीत संगीत अनिवार्य हो चला था, और केदार शर्मा, और डी.एन. मधोक के साथ-साथ मुंशी आरज़ू लखनवी और कवि प्रदीप प्रमुख गीतकारों के रूप में उभरने लगे। केदार शर्मा तो १९३६ की फिल्म “देवदास” के लिए ‘बालम आये बसों मेरे मन में...’ और ‘दुःख के दिन अब बीतत नाहीं...’ जैसे गीतों से पहले ही स्थापित हो चुके थे। ४० के दशक में भी उन्होंने फिल्म निर्देशन के साथ-साथ बहुत सी फिल्मों में गीत लिखे। १९४१ में आई “चित्रलेखा” में उनके गीत ‘सैयाँ साँवरे भये बाँवरे...’, ‘सुन सुन नीलकमल मुस्काए...’ और ‘तू जो बड़े भगवान बने...’ खासे लोकप्रिय हुए थे। फिल्म के संगीतकार थे उस्ताद झण्डे खाँ साहब। १९५० की फिल्म ‘बावरे नैन’ के ‘खयालों में किसी के...’, और ‘तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं...’ जैसे गीतों को भला कौन भूल सकता है। मुबारक बेगम का गाया ‘कभी तन्हाईयों में यूँ...’ (हमारी याद आएगी, १९६१) की कशिश, केदार शर्मा के फिल्म संगीत के योगदान की याद हमेशा दिलाती रहेगी। फिल्म “रतन” के ‘अखियाँ मिलाके जिया भरमा के...’ गीत से चर्चा में आये डी.एन. मधोक ने १९५१ की संगीतमयी फिल्म “तराना” में ‘बोल पपीहे बोल...’ (लता मंगेशकर, अनिल बिस्वास), ‘मोसे रूठ गयो...’ (लता, अनिल बिस्वास), और ‘जली जो शाख...’ (तलत, अनिल बिस्वास) जैसे गीत भी लिखे।

१९५० में अनिल दा के साथ फिल्म “बेक़सूर” में ‘मतवाले नैनों वाले की...’ और ‘आई भोर सुहानी आई...’ जैसे गीत लिखने वाले मुंशी आरज़ू लखनवी साहब इससे पहले “स्ट्रीट सिंगर” में आर.सी. बोराल (१९३८), “दुश्मन” और “डॉक्टर” में पंकज मालिक, “प्यार की मंजिल” में हुस्नलाल भगतराम और “सिपहिया” में सी. रामचन्द्र के साथ भी सफल जोड़ीदार साबित हुए थे। कवि प्रदीप की बात करें तो कह सकते हैं कि वो अपने दौर के सबसे क्रान्तिकारी गीतकारों में से एक रहे। ‘दूर हटो ए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है...’ (किस्मत, १९४३) से पूरे देश को झकझोरने वाले इस कवि-गीतकार ने लगभग १७०० गीत लिखे। ‘चल चल रे नौजवान...’ (बन्धन, १९४०), ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ...’, ‘दे दी हमें आजादी...’ (जागृति, १९५४) जैसे जाने कितने गीत थे प्रदीप के लिखे, जिन्हें देश का बच्चा-बच्चा गर्व से गाता फिरता था। आज भी ये गीत रोंगटे खड़े कर देते हैं। चीन के साथ हुए युद्ध के बाद वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए जब उन्होंने ‘ए मेरे वतन के लोगों...’ गीत लिखा तो पत्थर से पत्थर दिल भी पसीज कर रह गया। इस गीत को सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु की आँखें भी छलक उठी थीं और उन्होंने प्रदीप को राष्ट्रीय कवि की उपाधि दे डाली थी। ऐसा नहीं कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित कवि प्रदीप ने केवल देशभक्ति गीत ही लिखे हों, उनके लिखे कुछ अन्य गीतों की बानगी देखिये– ‘सूनी पड़ी रे सितार...’ (कंगन), ‘धीरे धीरे आ रे बादल...’ (किस्मत), ‘ऊपर गगन विशाल...’ (मशाल), ‘कितना बदल गया इंसान...’ (नास्तिक), ‘चलो चले माँ...’ (जागृति), ‘ओ दिलदार बोलो एक बार...’ (स्कूल मास्टर), ‘सूरज रे जलते रहना...’ (हरिश्चन्द्र तारामती) आदि। कवि प्रदीप के सरल शब्द जनमानस की चेतना में कुछ यूँ समा जाते थे जैसे उन्हीं के सूक्ष्म गहरे भावों का हिस्सा हों सदा से।

४० के दशक के आरम्भ में कुछ और गीतकार प्रमुख धारा में आये, जैसे पण्डित भूषण, तनवीर नकवी, कमर जलालाबादी, पण्डित नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, जोश मलिहाबादी, अख्तर-उल-ईमान, पण्डित मुखराम शर्मा और नक्शब। इनमें से भरत व्यास, कमर जलालाबादी और पण्डित नरेन्द्र शर्मा सबसे अधिक लोकप्रिय साबित हुए। “तूफ़ान और दीया”, “जिद्दी”, “परिणीता”, “दो आँखें बारह हाथ”, “नवरंग”, और “गूँज उठी शहनाई” जैसी सफल और सुरीले संगीत से सजी फिल्मों के लिए गीत रचने वाले भरत व्यास कुछ समय बाद पौराणिक और धार्मिक फिल्मों तक सीमित होकर रह गए। ‘ए मालिक तेरे बन्दे हम...’ और ‘ये कौन चित्रकार है...’ जैसे ढेरों अमर गीतों के लिखने वाले इस गीतकार ने “रंगीला राजस्थान’ नाम की एक फिल्म का निर्देशन भी किया था। कमर जलालाबादी ने हुस्नलाल भगतराम के साथ सफल गीतकार और संगीतकार की जोड़ी बनाई। खूबसूरत युगल गीतों- ‘सुन मेरे सजना...’ (आँसू, १९५३) से लेकर हलके-फुल्के अंदाज़ के गीतों- ‘आज पहली तारीख है...’ (पहली तारीख, १९५४), से संजीदा अंदाज़ के गीत- ‘दोनों ने किया था प्यार मगर...’ (महुवा), और चुलबुले नटखट मिजाज़ के गीत- ‘आईये मेहरबान...’, ‘मेरा नाम चिन् चिन् चूँ...’ (हावड़ा ब्रिज) तक कमर साहब ने अपनी कलम के जौहर जम कर दिखलाये। ‘दिल किसलिए रोता है, प्यार की दुनिया में ऐसा ही होता है...’ (मुलाकात, गायिका नसीम बानू, १९४७) जैसे यादगार गीतों-ग़ज़लों को रचने वाले कमर ने गुलाम हैदर से लेकर नए दौर के उत्तम सिंह जैसे संगीतकारों की धुनों पर भी शब्द बुने और कामयाब भी हुए। पण्डित नरेन्द्र शर्मा भी साहित्यिक दुनिया से होते हुए भी फ़िल्मी गीतों में बेहद सफल साबित हुए। ‘तुम्हें बाँधने के लिए मेरे पास क्या है, मेरा प्रेम है...’, संगीतकार सुधीर फडके के लिए उनके इस गीत को स्वर मिला लता मंगेशकर का, जिसके बाद मधुर गीतों की जैसे एक रसधारा सी फूट निकली। ‘ज्योति कलश छलके...’ और ‘सत्यम शिवम सुन्दरम...’ जैसे अमर गीतों को रचकर पण्डित जी सिने-संगीत-प्रेमियों के ह्रदय में सदा के लिए स्थापित हो गए।

आजादी से पहले ही ‘इप्टा’ से जुड़े बहुत से गीतकार एक नयी ऊर्जा लेकर फिल्म जगत में दाखिल हुए, जिनमें प्रेम धवन, अली सरदार जाफरी, विश्वामित्र आदिल, मनमोहन आनन्द, जिया सरहदी और मजरूह सुल्तानपुरी प्रमुख थे। १९४७ में मिली आजादी की खुशी और तत्पश्चात हुए बँटवारे का दर्द खुल कर बिखरा, इन गीतकारों की कलम से, क्योंकि अब ब्रिटिश प्रतिबन्ध का काला साया सर से उठा चुका था। भाषा का रूप-रंग भी अब कुछ बदल गया था। जहाँ पहले के गीतों में अवधी, पूरबी और भोजपुरी शब्दों की अधिकता थी वहीँ अब आधुनिक उर्दू और हिन्दी की खड़ी बोली का प्रयोग जम कर होने लगा। १९४५ से १९४७ तक आते-आते भाषा का शहरीकरण हो चुका था, जो अब एक मिश्रित रूप था, सरल बोलचाल वाले हिन्दी और उर्दू के शब्दों का। इस  बदलाव में मजरूह सुल्तानपुरी और प्रेम धवन ही लम्बे समय तक कमान थामे खड़े रह सके। वहीँ कवि गीतकार गोपाल सिंह 'नेपाली' ने इस दौर में अपने दिलकश गीतों से एक अल्हदा ही पहचान बनायीं.

प्रेम धवन ने १९४८ की फिल्म “जिद्दी” से अपना सफर शुरू किया। ये वही फिल्म थी जिसमें किशोर कुमार ने पहली बार देव आनन्द के लिए गया था– ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ...’। उन्होंने “तराना” (अनिल बिस्वास), “मिस बॉम्बे” (हंसराज बहल), “जागते रहो” और “काबुलीवाला” (सलिल चौधरी), “दस लाख”, और ‘एक फूल दो माली” (रवि), “अपलम चपलम” (चित्रगुप्त), और “हम हिन्दुस्तानी” (उषा खन्ना) के लिए कई अच्छे  गीत लिखे। उनकी कलम से- ‘छोडो कल की बातें...’ (हम हिन्दुस्तानी), ‘ए मेरे प्यारे वतन...’ (काबुलीवाला) जैसे गीत निकले. मनोज कुमार ने उन्हें गीतकार–संगीतकार की दोहरी भूमिका में आजमाया और १९६५ की फिल्म ‘शहीद’ में ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला...’, ‘जोगी हम तो लुट गए...’, ‘ए वतन ए वतन...’ आदि गीत उनके सबसे यादगार गीतों में शामिल था। वहीँ दूसरी तरफ मजरूह ने नौशाद से लेकर ए.आर. रहमान तक के लिए गीत लिखे। बरसों-बरस उनकी कलम से गीतों के झरने बहते रहे। फिल्म “शाहजहाँ” के ‘जब दिल ही टूट गया...’ से लेकर “पुकार” के ‘सुनता है मेरा खुदा...’ तक जाने कितने गीत हैं दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित इस गीतकार के हिस्से में, जिसने बरसों-बरस श्रोताओं को झूमने, गुनगुनाने को मजबूर किये रखा। पंचम के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी (तीसरी मंजिल, कारवाँ, प्यार का मौसम, हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात, ज़माने को दिखाना है आदि), मगर उन्हें एकमात्र फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के साथ, फिल्म “दोस्ती” के अमर गीत ‘चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे...’ के लिए। चौकलेटी चेहरे वाले आमिर खान के जज़्बात उनके शब्दों में युवा दिलों पर छा गए (याद करें ‘पापा कहते हैं...’- फिल्म क़यामत से क़यामत तक)। उम्र की तीसरी पायदान पर आकर भी उनकी कलम से ‘पहला नशा’ जैसा गीत निकला जो प्रेम की पहली-पहली अनुभूति को व्यक्त करता शायद सबसे उत्कृष्ट गीत है।

१९४७ के आते-आते नौशाद देश के पहले स्टार संगीतकार के रूप में उभरने लगे थे। उनके साथ सबसे अधिक जोड़ी जमी, शकील बदायूनीं की। नौशाद के साथ उनकी सफल यात्रा शुरू हुई फिल्म “दर्द” से (‘अफसाना लिख रही हूँ...’ उमा देवी) और “बैजू बावरा” (१९५२), “मदर इण्डिया” (१९५७), “मुग़ल-ए-आज़म” (१९६०), “गंगा जमुना” (१९६१), “मेरे महबूब (१९६३) तक सफलता की एक अमर कहानी लिखती चली गयी। नौशाद के इतर उनकी जोड़ी रवि के साथ (चौदहवीं का चाँद, घराना), रोशन (नूरजहाँ) और हेमन्त कुमार (साहिब बीबी और गुलाम) में भी खूब जमी। उनके शब्दों में मिटटी की महक थी, एक भीनी-भीनी सरलता थी जो सीधे दिल में उतर जाती थी। १९४७-४८ के दौरान ही उभरकर आए राजेन्द्र कृष्ण। देश के चहेते महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि देते हुए राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था ‘सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी...’ (संगीत –हुस्नलाल भगतराम), जिसे सुनकर पूरा देश रोया था। एक गीतकार होने के साथ-साथ राजेन्द्र एक सफल पटकथा लेखक भी थे और १९९० तक सक्रिय रहे। “अनारकली”, “नागिन”, “भाई भाई”, “अदालत”, जैसी ढेरो फिल्मों में उनके यादगार गीत रहे। ‘धीरे से आजा री अँखियन में निंदिया...’ (अलबेला), ‘उनको ये शिकायत है...’, और ‘यूँ हसरतों के दाग...’ (अदालत), ‘ये जिन्दगी उसी की है...’, ‘जाग दर्द-ए-इश्क जाग...’ (अनारकली), ‘तुम्हीं मेरे मन्दिर...’ (खानदान), ‘आँसू समझ के क्यों मुझे...’ (छाया), जैसे गीत क्या श्रोता कभी भूल पायेंगें?

१९४९ में शोमैन राजकपूर ने दो बड़े गीतकार दिए फिल्म इण्डस्ट्री को शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के रूप में। शैलेन्द्र निःसन्देह इण्डस्ट्री को मिले सर्वश्रेष्ठ गीतकारों में से एक थे। एक अच्छे कवि होने के बावजूद वह कविता और फ़िल्मी गीतों के बीच के फर्क को बखूबी समझते थे। प्रेम की गहरी अनुभूति हो, या सामाजिक व्यवस्था पर कटाक्ष, उनके शब्द सुनने वालों को कभी भी पराये नहीं लगे। जितनी गहराई तक उनके गीत श्रोताओं के दिलों को छू पाए, उसकी मिसाल बहुत कम ही देखने को मिलती है। ‘आवारा हूँ...’, ‘मेरा जूता है जापानी...’, ‘सब कुछ सीखा हमने...’, ‘सजन रे झूठ मत बोलो...’, ‘काँटों से खींच के ये आँचल...’, ‘ओ जाने वाले हो सके तो...’, ‘मौसम बीता जाए...’, ‘ओ सजना बरखा बहार आई...’, ‘टूटे हुए ख़्वाबों ने...’ ‘खोया खोया चाँद...’ ‘ये मेरा दीवानापन है...’ जैसे ढेरों अमर गीत निकले, इस महान गीतकार की कलम से। फणीश्वर नाथ रेणु की एक लघु कथा को “तीसरी कसम” के रूप में परदे पर साकार कर शैलेन्द्र ने सिने-जगत को एक अनमोल कृति दी है। जहाँ शैलेन्द्र ने सभी आमो-खास के दिल में अपनी जगह बनायीं वहीँ हसरत जयपुरी प्रेम गीतों के सबसे सफल गीतकार माने गए। ‘जिया बेकरार है...’, ‘छोड़ गए बालम...’ (बरसात), ‘जिन्दगी एक सफर है सुहाना...’ (अंदाज़), ‘पंख होते तो उड़ आती...’ (सेहरा), ‘तेरे ख़यालों में हम...’ (गीत गाया पत्थरों ने), ‘दुनिया बनाने वाले...’ (तीसरी कसम), ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर...’ (संगम) आदि उनके कुछ लोकप्रिय गीतों में से हैं।

१९४८ के आसपास फिल्म जगत को मिला एक नायाब शायर का साथ भी, जो एक मुक्कमल गीतकार भी साबित हुए। सिने-संगीत के शौक़ीन कितने लाजवाब गीतों से वंचित रह जाते अगर साहिर लुधियानवी नहीं होते। साहिर शायद एकमात्र ऐसे गीतकार थे जो संगीतकार की दी हुई धुन पर न लिखकर उन्हें अपने शब्दों पर धुन बनाने को कहते थे। उनके चुने हुए शब्द शायराना होते हुए भी सुनने में सहज और धुनों में पिरोने के लिए सटीक होते थे, यही वजह थी कि उनकी इस माँग को लेकर किसी संगीतकार को कोई तकलीफ नहीं होती थी। साहिर देश के पहले “स्टार” गीतकार साबित हुए, जिनके  व्यक्तिगत जीवन की प्रेम कहानियाँ भी चर्चा का विषय बनी। उन्हें अपने शब्दों पर खासा विश्वास था और वो हर गीत के लिए मेंहनताने के रूप में उन दिनों की सबसे महँगी गायिका लता मंगेशकर से एक रूपया अधिक लिया करते थे। रवि, बर्मन दा, रोशन और खय्याम के साथ मिलकर उन्होंने एक से बढकर अमर गीत रचे। खुद को ‘पल दो पल का शायर...’ कहने वाले साहिर ने लीक से हटकर समाज को आईना दिखाते हुए ऐसे-ऐसे गीत लिखे जिनकी चोट आज भी दिलों में टीस उठा जाती है। कुछ बानगी देखिये– ‘संसार से भागे फिरते हो...’ (चित्रलेखा), ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...’, ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं...’ (प्यासा), ‘वो सुबह कभी तो आएगी...’ (फिर सुबह होगी) आदि। उनके शब्द संवेदनाओं को झकझोरते थे, पीड़ा को अभिव्यक्ति देते थे और जीवन को गहराई से समझने में कारगर थे। १९७१ में साहिर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

१९४९ तक आते-आते फ़िल्मी गीतों में और अधिक सरलता आ गयी, हलके-फुल्के चुलबुले गीत भी श्रोताओं को लुभाने लगे। ‘शाम ढले खिडकी तले...’ (राजेन्द्र कृष्ण), ‘जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी...’, ‘माना जनाब ने पुकारा नहीं...’ (मजरूह)। अब गीतों में आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग बढ़ने लगा और फ़िल्मी गीतों की एक नयी भाषा प्रचलित होने लगी। “प्यासा” के अमर गीतों को रचने के बाद आपसी मतभेदों के चलते साहिर ने बर्मन दा के साथ काम करने से इनकार कर दिया। तब गुरुदत्त ने एक और शायर गीतकार को फिल्म “कागज़ के फूल” में मौका दिया, ये थे कैफी आज़मी। ‘बिछड़े सभी बारी बारी...’, ‘वक्त ने किया...’ जैसे गीत रचने वाले कैफी ने “हीर राँझा” के रूप में एक कवितामयी फिल्म ही लिख डाली, जो आज भी एक मिसाल है। कैफी ने चुनिन्दा फिल्मों में ही काम किया मगर जो भी किया बेहतरीन किया। “गरम हवा”, “हकीकत”, “कोहरा”, “अनुपमा”, “पाकीज़ा”, “हँसते जख्म”, “अर्थ”, और “रज़िया सुलतान” जैसी फिल्मों में उनके गीत भुलाये नहीं भूलेंगें। फिल्म “नसीम” में उन्होंने एक यादगार भूमिका भी निभाई थी। ६० का दशक आते-आते फ़िल्में संगीत प्रधान हो चली थी। कुछ फ़िल्में तो लचर कहानियों के बावजूद आज भी सिर्फ अपने गीत-संगीत के लिए याद रखी जाती हैं। संगीत की दुनिया में पंचम, एल.पी. (लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल), और कल्याणजी आनन्दजी पहले से स्थापित शंकर जयकिशन, रोशन और नौशाद को कड़ी टक्कर दे रहे थे। ऐसे में फिल्म जगत को मिला, मिनटों में धुन पर सटीक गीत रचने वाला, आम आदमी की जुबाँ बोलने वाला एक गीतकार, आनन्द बक्शी के रूप में। फिल्म “मिलन” में उन्होंने लिखा ‘सावन का महीना...’ और उसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। बक्शी साहब ने कई हज़ार गीत लिखे और दशकों तक सिने-दुनिया में छाये रहे। फिल्मों में सबसे लम्बी पारी खेलने वाले संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की सफलता में उनके सरल गीतों का बहुत बड़ा योगदान रहा। उनपर चालू और सस्ते गीत लिखने के आरोप भी लगे, मगर सच्चे संगीत के कद्रदान कैसे भूल सकते हैं कि उन्होंने ‘चिंगारी कोई भडके...’, ‘आदमी मुसाफिर है...’, ‘मगर रो पड़े...’, ‘सोलह बरस की...’, ‘सावन के झूले पड़े...’, ‘हम तो चले परदेस...’ ‘जिन्दगी के सफर में जो गुजर जाते हैं...’, ‘मेरे नैना सावन भादो...’ जैसे गीत भी लिखे थे। ‘तूने काजल लगाया दिन में रात हो गयी...’ जैसी पक्तियों से आम आदमी की संवेदनाओं को भी गुदगुदा देते थे और ‘चोली के पीछे...’ जैसे तथाकथित अश्लील गीतों को लिखकर सुर्खियाँ भी बटोर लेते थे।

जहाँ बक्शी साहब के शब्दों मे सरलता और हल्कापन था वहीँ कुछ अनूठे शब्द-युग्म और ताजगी भरे बिम्बों के साथ मैदान में उतरे गुलज़ार। यहाँ सोच का विस्तार तो था मगर एक अजब सी सरलता भी थी। इतने सहज रूप में कविता को गीतों में मिलाने का काम सिर्फ और सिर्फ गुलज़ार ही कर सकते थे। गुलज़ार प्यार को प्यार न कहकर ‘आँखों की महकती खुशबू...’, कहते थे और फिर ‘रोज रोज उन्हीं आँखों तले...’ एक सुरीला ख्वाब बुनते रहे। ‘कभी ज़िन्दगी से रूबरू होकर’ (तुझसे नाराज़ नहीं) तो कभी ‘पाँव तले जन्नत’ चला कर (छैय्याँ छैयाँ) गुलज़ार श्रोताओं के लिए ‘सात रंग के सपने’ बुनते रहे। पंचम के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी, और नए दौर में भी हृदयनाथ मंगेशकर, विशाल भारद्वाज और ए.आर. रहमान के लिए गुलज़ार ने नायाब गीत लिखे। ‘जय हो’ के लिए उन्हें अकादमी पुरस्कार भी मिला, और इस प्रतिष्टित पुरस्कार को पाने वाले वह इकलौते भारतीय गीतकार बने। गुलज़ार ने बहुत सी सफल फिल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। गुलज़ार आज दशकों बाद भी उतने ही लोकप्रिय है। एक जीवन्त किंवदन्ती।

८० के दशक में फिल्मों में मार-धाड़ की प्रमुखता हो गयी और संगीत का माधुर्य कहीं खोने लगा। फिर भी मजरूह, आनन्द बक्शी, और गुलज़ार के साथ-साथ गुलशन बावरा (‘तेरी दुनिया से...’, ‘यारी है ईमान मेरा...’, ‘मेरे देश की धरती...’, ‘जीवन के हर मोड़ पे...’, ‘चाँदी की दीवार न तोड़ी...’ आदि), इन्दीवर (‘कसमे वादे प्यार वफ़ा...’, ‘चन्दन सा बदन...’, ‘मधुबन खुशबू देता है...’, ‘ज़िन्दगी का सफर...’, ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा...’, ‘समझौता ग़मों से कर लो...’ आदि), और अनजान (‘आपके हसीन रुख पे...’, ‘आपकी इनायतें आपके करम...’, ‘ओ साथी रे...’, ‘दिल तो है दिल...’, ‘जिसका कोई नहीं...’, ‘खाईके पान बनारस वाला...’, ‘छूकर मेरे मन को...’ आदि) श्रोताओं को मधुर गीतों की सौगात देते रहे। कुछ नाम ऐसे भी रहे जिनका योगदान संख्यात्मक लिहाज बेशक कम रहा मगर गुणात्मक रूप में उन्हें भूल पाना असम्भव ही होगा जैसे अमृता प्रीतम (कादम्बरी, गीत– ‘अम्बर की एक पाक सुराही...’), राजकवि इन्द्रजीत सिंह तुलसी (शोर, गीत– ‘जीवन चलने का नाम...’, ‘सोने का चबूतरा...’), शहरयार (उमराव जान, गमन), जिया सरहदी (अनोखा प्यार), आह सीतापुरी (मूर्ति, संगीत– नौशाद), साजन देहलवी (ठोकर, संगीत– श्यामजी घनशयामजी, गीत– ‘मैं ढूँढता हूँ जिनको...’), सन्तोष आनन्द (प्रेम रोग, रोटी कपडा और मकान, गीत– भँवरे ने खिलाया फूल...’, ‘मैं न भूलूँगा...’, ‘और नहीं बस और नहीं...’),  नक्श लायलपुरी (दर्द), खुमार बाराबंकवी  (रुखसाना), योगेश (आनन्द, रजनीगन्धा, छोटी सी बात), एस.एच. बिहारी (सावन की घटा, भाई भाई, प्यार झुकता नहीं), सावन कुमार टाक (हवस, सौतन, गीत– ‘तेरी गलियों में न रखेंगें कदम...’, ‘ज़िन्दगी प्यार का गीत है...’), प्रकाश मेहरा (जंजीर, शराबी, लावारिस, गीत- ‘मंजिलें अपनी जगह हैं...’, ‘और इस दिल में क्या रखा है...’), देव कोहली (मैंने प्यार किया), जाँनिसार अख्तर (सुशीला, गीत- ‘गम की अँधेरी रात...’), राजा मेंहदी अली खान (मेरा साया, वो कौन थी, अनपढ़), रामावतार त्यागी (जिंदगी और तूफ़ान, गीत– ‘एक हसरत थी...’), बसन्त देव (उत्सव, गीत– ‘साँझ ढले गगन तले...’, ‘मन क्यों बहका...’), सुदर्शन फाकिर (दूरियाँ, गीत– ‘ज़िन्दगी मेरे घर आना...’), असद भोपाली (पारसमणि, एक सपेरा एक लुटेरा), निदा फाजली (विजय, इस रात की सुबह नहीं, सुर), नीरज (गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, शर्मीली, प्रेम पुजारी, नयी उम्र की नयी फसल, चा चा चा), एम.जी. हशमत (कोरा कागज, तपस्या), बहजाद लखनवी (आग, गीत – ‘ज़िन्दा हूँ इस तरह...’), किशोर कुमार (नील गगन की छाँव में), हसन कमाल (बाजार) आदि। गीतकार-संगीतकार रवीन्द्र जैन.का उल्लेख भी विशेष रूप से जरूरी है। इस बेहद सफल संगीतकार ने खुद ढेरों गीत भी लिखे, जिनका कोई सानी नहीं, जैसे– ‘अँधेरे में जो बैठे हैं...’, ‘फकीरा चल चला चल...’, ‘सजना है मुझे...’, ‘घुँघरू की तरह...’, ‘गीत गाता चल...’, ‘राधा का भी श्याम हो तो...’, ‘गोरी तेरा गाँव...’, ‘कहाँ से आये बदरा...’ और फिल्म “राम तेरी गंगा मैली” में उनके लिखे अधिकतर गीत यादों में सदा बसे रहेंगें। नीरज और योगेश, जिनका जिक्र हमने ऊपर किया गया है, उन्होंने फ़िल्मी गीतों में बेहद नए प्रयोग भी किये। नीरज का ‘फूलों के रंग से...’ और ‘दिल आज शायर है...’ फ़िल्मी गीतों की आम ‘मुखड़ा’, ‘अन्तरा’ परम्परा से काफी अलग थे, जबकि उनका लिखा ‘स्वप्न झरे फूल से...’ तो पूरी तरह एक कविता ही थी। इसी तरह योगेश ने ‘न जाने क्यों...’ में एक अलग पैटर्न रचा गीत का। गुलज़ार ने भी ‘मेरा कुछ सामान...’ काव्यात्मक अंदाज़ में लिखकर श्रोताओं को चौंकाया था।

नब्बे के दशक के आरम्भ में संगीत की दुनिया में एक नयी बयार लेकर आये, नदीम श्रवण, आनन्द मिलिन्द (चित्रगुप्त के जुड़वा बेटे), जतिन ललित, इस्माईल दरबार, अनु मालिक, और ए.आर. रहमान. ऐसे में गीतकार के रूप में उभरे समीर (जो गीतकार अनजान के बेटे हैं), जावेद अख्तर, और महबूब। जावेद अख्तर जो कि पहले सलीम के साथ जोडीदार थे, पटकथा लेखक के रूप में, उन्हें यश चोपड़ा ने गीतकार बनने का न्योता दे डाला जिसे आरम्भिक हिचक के बाद उन्होंने स्वीकार कर लिया और इण्डस्ट्री को मिला एक और उत्कृष्ट गीतकार। ८० के दशक में स्क्रीन लेखन से एंग्री यंगमैन को रचने वाले जावेद ने पंचम के साथ मिलकर “१९४२ – ए लव स्टोरी” के संगीत को अमर कर दिया। ये पंचम की अन्तिम फिल्म साबित हुई। ‘सो गया ये जहाँ...’ (तेज़ाब), ‘हम न समझे थे...’ (गर्दिश), ‘सच मेरे यार हैं...’ (सागर), ‘तुमको देखा तो ये ख़याल आया...’ (साथ साथ), और ‘देखा एक ख्वाब...’ (सिलसिला) जैसे गीत लिखकर ९० के दशक में छाये रहे तो नयी सदी में ए.आर. रहमान के लिए “लगान”, “स्वदेश”, और “सपने”, अनु मालिक के साथ “बोर्डर” और “एल ओ सी”, और शंकर एहसान लॉय के लिए “दिल चाहता है” “लक बाई चांस”, और “कल हो न हो” जैसी फिल्मों में गीत लिखकर आज भी सक्रिय हैं।

महबूब ने ए.आर. रहमान के लिए “बॉम्बे”, “रंगीला”, “वन्देमातरम” (अल्बम), और “तक्षक” जैसी फ़िल्में की, इस्माईल दरबार के लिए उन्होंने “हम दिल दे चुके सनम” और “देवदास” के गीत लिखे, पर ये प्रतिभाशाली गीतकार लम्बे समय तक सक्रिय न रह सका। वहीँ दूसरी तरफ नदीम श्रवण और आनन्द मिलिन्द के लिए समीर ने ढेरों गीत लिखे (याद करें– “दिल”, ‘आशिकी”, “साजन” आदि)। पर उनका दौर खत्म होते-होते लगा कि वो भी कहीं गुमनामी में खो जाएँगे, पर समीर ने “कुछ कुछ होता है” से अपनी वापसी की। आजकल वो समीर अनजान के नाम से लिख रहे हैं। नयी सदी में भाषा बदली है और गीतों का स्वरूप भी पूरी तरह नया हो चुका है। आज के दौर में प्रसून जोशी (रंग दे बसंती, फ़ना, तारे ज़मीन पर, दिल्ली ६), इरशाद कामिल (रोंकस्टार, जब वी मेट), पियूष मिश्रा (आजा नचले, गुलाल), सैयद कादरी (लाइफ इन ए मेट्रो), जयदीप साहनी (चक दे इण्डिया, रब ने बना दी जोड़ी), स्वानन्द किरकिरे (परिणीता, ३ इडियट्स) और अमिताभ भट्टाचार्य (देव डी, उड़ान, अग्निपथ) जैसे गीतकारों के चलते संगीत में फिर से माधुर्य लौट आया है। बीते ८० वर्षों में फ़िल्मी गीतों में एक लम्बा सफर तय किया है। फिल्मों में गीत लिखने के लिए गीतकार को बहुत लचीला होना पड़ेगा। उसे शब्दों की ध्वनियों की समझ रखनी होगी, धुन और मीटर की पकड़ सशक्त होकर थामनी होगी, कम और सरल शब्दों में बहुत कुछ कहने का हुनर भी उसके लिए लाजमी होगा। चूँकि गीत एक टीम वर्क है, उसे संगीतकार और गायक-गायिका के साथ संगत कर गीत को सजाना सँवारना भी होगा। इन्हीं खूबियों के चलते फिल्म में गीतकार को खास महत्त्व दिया जाता है। यह एक तकनीकी काम है मगर किसी संस्था में इसे सिखाया नहीं जा सकता। उभरते हुए गीतकारों के लिए अब तक बने ढेरों गीतों का विशाल खज़ाना मौजूद है, सन्दर्भ के लिए। बस बदलते समय के हिसाब से खुद को ढालते चले जाना है। जब तक हमारे देश में फ़िल्में बनेगीं, उनमें संगीत एक अहम घटक रहेगा, गीतकारों के लिए चुनौतियाँ यूँ ही कायम रहेंगी। नए गीतकारों को नए शब्द गढ़ने ही होंगें, ज़िन्दगी, रिश्ते, प्यार और समाज की कहानियों को दोहराने के लिए।