18.4.08

सुलगता दर्द ( कश्मीर )

उन खामोश वादियों में,
किसी शांत सी झील पर,
जब लुढ़क कर गिरता है,
कोई पत्थर, किसी पहाडी से,
तो उसे लगता है-
कहीं बम फटा...
वह दोनों कानों पर हाथ रखकर,
चीखता है , और सहम कर सिमट जाता है,
अपने अंधेरों में,
अंधेरे - जो पाले हैं उसने,
अपनी आखों में,
अंधेरे - जो बहते हैं उसकी रगों में,
उसकी बंद ऑंखें,
कभी खुलती नही रोशनी में,
एक बार देखी थी, उजाले में मैंने,
वो ऑंखें,
"ऐ के ४७" की गोलियों के सुराख थे उसमें,
धुवाँ सा जल रहा था,
उस पथरीली जमीं पर,
कोई लहू का कतरा न था,
मगर कल रात जब वो,
कुरेद रहा था मिटटी,
मसल रहा था फूल पत्तियों को,
बेदिली से तब,
हाँ तब... उसकी उन आखों से बहा था,
खौलते लावे सा,
गर्म "सुलगता दर्द..."

10.3.08

एक किरदार

रोज सुबह जब वो देखता है,
अपने बच्चे की पीठ पर टंगा बस्ता,
तो उसकी छाती दो इंच फूल जाती है,
वह अपनी झुग्गी से लेकर,
किशना के स्कूल तक,
रोज पैदल ही उसे छोड़ने जाता है,

पूरे रास्ते किशना चुप रहता है,
और वह खुश हो होकर समझाता रहता है -
"रोज का पाठ रोज याद करना,
मैडम जी की बात मानना,
जो समझ में न आवे तो उठ कर पूछना,
तू पूछता ही नही है कुछ"

यूं भी उसका स्वर तेज़ है,
मगर उसकी आवाज़ उस गली से गुजरते वक्त
और तेज़ हो जाती है -
जहाँ कोठियाँ है बड़े बड़े रईसों की .

2.2.08

आईये एकजुट होकर संवारे हिन्दी ब्लोग्गिंग जगत को - स्नेह निमंत्रण

दोस्तों , करीब जब तीन महीने पहले, जब मैंने ऋषि एस बालाजी और सुबोध साठे के साथ मिल कर अपना पहला "इंतेर्नेटिया " गीत " सुबह की ताज़गी " रेकॉर्ड किया था, तब बिल्कुल नही सोचा था की मात्र तीन महीनों मे एक पूरा एल्बम तैयार हो जाएगा, पर एक एक करके संगीतकार, गीतकार , गायक जुड़ते चले गए, और एक असंभव सा दिखता सपना आज सच हो गया, यह सब आप सब के स्नेह, सहयोग, और प्रोत्साहन के बिना कतई संभव नही था, इसीलिए तो हिंद युग्म ने अपने सभी स्नेही पाठकों से ही इसका इंटरनेट पर अनावरण करवाने की योजना बनायीं, आप सब से अनुरोध है कृपया इस लिंक पर आयें "पहला सुर" और सी डी वाले चित्र पर क्लिक करें , और अपने करकमलों से ये शुभ काम कर हमे आशीर्वाद दें ।

एक और खुशखबरी है, हिंद युग्म को विश्व पुस्तक मेले में एक स्टैंड अम्बंतित हुआ है जहाँ हम इस सी डी को विक्रय के लिए रखेंगे, पधारिये इस स्टैंड पर क्योंकि यह मात्र हिंद युग्म का नही, पूरे हिन्दी ब्लोग्गिंग जगत का एक झरोखा होगा, विश्व पुस्तक मेले जैसे बडे मंच पर, इन दस दिनों में हमारी कोशिश रहेगी की अधिक से अधिक लोगों को इंटरनेट पर हिन्दी भाषा से जोड़ने की, ब्लोग्गिंग की ताक़त अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे आखिर यही तो हम सब चाहते हैं न ? तो क्यों न एकजुट होकर इस प्रयास को एक आन्दोलन बना दें।

हिंद युग्म के स्टैंड का पता है

हॉल नं॰ १२एस्टैंड नं॰

एस-१/१३१प्रगति मैदान,

नई दिल्ली



अरे हाँ एक जरूरी आमंत्रण तो मैं देना भूल ही गया, ३ तारिख , रविवार, दुपहर १.३० बजे आप सब ने अवश्य ही आना है, इसी एल्बम " पहला सुर" के औपचारिक विमोचन पर, इतने बडे मंच पर, एक हिन्दी ब्लोग के किसी प्रोडक्ट के विमोचन का शयाद ये पहला मौका होगा, अधिक से अधिक संख्या में आकर इस आयोजन को सफल और यादगार बनायें, आने का स्थान यह है -



हॉल नं॰ ६,

मेज़ानाइन फ़लौर,
कॉन्फ्रेंश रूम-१,
प्रगति मैदान,
नई दिल्ली
समय- दोपहर २-४, ३ फरवरी २००८

चलिए फ़िर वहीं मुलाकात होगी आप सब से, किसी भी असुविधा की स्थिति में सम्पर्क करें -09871123997 ( मेरा )09873734046 ( शैलेश भारतवासी )


24.12.07

सिंहासन सजाओ

सिंहासन सजाओ,
विजय गीत गाओ,
कि एक बार फिर बिठा दिया है,
जनता जनार्धन ने,
उसे तख्ते-ताउस पर,
जो सरे-आम कहता है कि -
"हाँ मैंने हत्याएं करवाई हैं,
बिगाड़ लो क्या बिगाड़ सकते हो मेरा",
आज ताज पोशी है उसकी,
जो भरे-बाज़ार में सीना ठोक कर
कहता है -
हाँ मैंने घोम्पी है
हामलाओं के पेट में तलवारें,
हाँ मैंने कलम किये हैं,
मासूमों के धड़ से सर,
हलाल किये मजहब के नाम कर कितने,
नफरत के तंदूर में मैंने,
सेंकी है राजनीति की रोटियां,

भेड़चाल के इस देश में अब,
खूब फैलेगी "मुखौटो" की जादूगरी,
खडे हो जायेंगे जाने कितने,
कुर्तानुमा कट शर्ट पहने,
हिटलर नुमा नेता,
अनाप शनाप चुनावी बयानों को,
राजनीती का साहित्य माना जाएगा अब,
एन्कोउन्टर विशेषज्ञ पूजे जायेंगे,
सिंहासन सजाओ,
विजय गीत गाओ,
लोकतंत्र के अखाडे का,
ये खेल भी क्लासिक है।
धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए,
आज का दिन एतिहासिक है।

9.11.07

एक छोटा न नज़राना, इस दिवाली पर शुभकामनाओं सहित

इश्वर करे कि आज माँ लक्ष्मी

आप सब के घर पधारे,

और फिर कभी न जाये....



समृधी और खुशियों से भरी हुई हो आप सब के लिए यह दिवाली

मेरे सभी ब्लोगीय साथियों को तहे-दिल से शुभकामनाएं ।



शुभ लाभ







शुभ दीपावली



आप भी कहेंगे की ये तो सूखी सूखी बधाई हुई भाई,

तो लीजिये काव्यात्मक बधाई भी लीजिये यहाँ

" दिवाली की रात "

और तोहफा, तोहफा तो वही है इस बार, मेरा पहला इन्तेर्नेटिया गीत।

क्या कहा, आपने अभी तक नही सुना,

तो लीजिये सुनिए जनाब यहाँ "
सुबह की ताज़गी"

और अगर सुन भी रखा हो तो दोबारा सुन लीजिये,

मुझे विश्वास है आपको अच्छा ही लगेगा।




त्यौहार मनाइये सपरिवार, और भरपूर आनंद लीजिये

22.10.07

परदेस में तेरी यादें

परदेस में तेरी यादें,
पागल करती है मन को,
क्या कभी सच होगा वो ख्वाब,
जो हमने बुना था .

मुझे याद है आखिरी बार,
जब तुम मेरे साथ चल रही थी,
बुझी हुई उदास ऑंखें,
बिन बोले, बहुत कुछ कह रही थी,
मैंने हाथ हिला कर तुमसे विदा कहा,
तुम्हारे भी हाथ उठे,
मगर चहरे को छुपाकर, आंसू बहने के लिए.

मैं तुमसे बहुत दूर,
तुम्हारी आँखों से ओझिल हो गया,
तब मुझे याद है ,
तुमने जोर से मुझे आवाज़ दी थी,
तुम्हारी पुकार,
कोई भी न सुन सका था,
सिर्फ़, मेरे कानों ने सुना था....

24.9.07

ह्रदय

छुई मुई है ह्रदय,
छू लो तो मुरझा जाता है,
किरणों के पंख तो लग नही सकते,
फिर क्यों ये छूना चाहता है,
- सूरज की जलती आग को।

रेशमी धागों में देखो,
बाँधता ही जाता है पल पल,
रिश्तों के दल दल में देखो,
धंसता ही जाता है पल पल,
एक ख़्वाब जो टुटा तो क्या,
फिर नया ख़्याल पल पल,
मुझ से ही कुछ रूठा रूठा,
मेरा ही दर्पण वो पल पल।

और बारिशों के मौसमों मे,
शाखों से होकर गुजरना,
शबनमी अहसास लेकर,
पथरीली गलियों पे चलना,
भागती दुनिया से हटकर,
अपनी ही राहें पकड़ना,
शौक़ इसके हैं निराले,
कब तलक कोई संभाले,
क्या करूं, मुश्किल है लेकिन,
खुद से ही बचकर गुजरना।