ताज़ा गीत- love Story

22.3.12

आदत

कभी कभी यूँहीं अकेला,
निकल जाता हूँ मैं वहाँ,
जहाँ तनहाईयाँ हो,
जहाँ वक्त ठहरा हुआ सा लगे,
जहाँ भीड़ हो दरख्तों की,
खुशबुएँ हो फूल पत्तियों की,
नदियों के कल कल शोर में भी,
खामोशियों के भंवर खुले जहाँ,

अच्छे तो लगते हैं,
गूँजते सन्नाटे पहाड़ों के,
मगर ऊब जाता हूँ,
सकूं दिल का ढूँढता हुआ,
कुछ रोज भटकता हूँ,
फिर लौट आता हूँ यहाँ -

जहाँ भीड़ है रिश्तों की,
खुशबू है मोहब्बत की,
जहाँ संघर्षों का पसीना है,
आरजुओं के भँवर है तो,
सन्नाटे हैं एहसासों के,
और एक उलझा हुआ,
ताना बाना है, सुख दुःख का,
शायद मेरा अक्स यही है,
यही मेरा दर्पण है,
अपनी परछाई इन्हीं उजालों में,
नज़र आती है मुझे

कोई टिप्पणी नहीं: