ताज़ा गीत- love Story

10.7.07

आम आदमी

लफ्ज़ रूखे, स्वर अधूरे उसके,
सहमी सी है आवाज़ भी,
सिक्कों की झंकारें सुनता है,
सूना है दिल का साज़ भी,

तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता - आम आदमी ।

मौन दर्शी हर बात का ,
धूप का बरसात का,
आ जाता बहकाओं में ,
खो जाता अफवाहों में,
मिलावटी हवाओं में,
सडकों में फुटपाथों में,

मिल जाता है अक्सर कतारों में,
राशन की दुकानों में,
दिख जाता है अक्सर,
अपनी बारी का इंतज़ार करता -
दफ्तरों -अस्पतालों के बरामदों में ,

क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी -
आम आदमी ।

11 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी -
आम आदमी ।


--जागरुकता का प्रश्न है!! हमारे चुने प्रतिनिधी और हमसे ही कटे हुये.

परमजीत बाली ने कहा…

कविता मे एक आम आदमी का सही चित्रण किआ है।

तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता - आम आदमी ।

sunita (shanoo) ने कहा…

सजीव जी आदमी का क्या खूब चित्र खेंचा है आपने...बहुत अच्छी लगी...

सुनीता(शानू)

Divine India ने कहा…

सही चित्रित कविता…सुंदर है…।
मगर यही आम आदमी दुनियाँ भर में क्रांति का सूचक रहा है…।

mamta ने कहा…

आपने आम आदमी का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है ।

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी -
आम आदमी ।

यह प्रश्न भी है और इसमें छुपा गहरा उत्तर भी। बहुत सुन्दर रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Beji ने कहा…

सुन्दर रचना।

sajeev sarathie ने कहा…

सुनील डोगरा ज़ालिम said...
जनाब खुल के लिखिए। आप जॊ हुनर छिपाए हैं वह तॊ बहुत दुर्लभ है।

3:15 अपराह्न


रंजू said...
क्यों है आख़िर अपनी ही सत्ता से
कटा-छठा
क्यों है यूं अपने ही वतन में अजनबी- आम आदमी।

बहुत कुछ कह गयी गयी आख़िरी पंक्तियाँ...

4:18 अपराह्न


अजय यादव said...
एक आम आदमी के दर्द को आप ने बखूबी ज़ाहिर किया है. अति सुंदर!

5:27 अपराह्न


आर्य मनु said...
आम इंसान के दर्द का सजीव चित्रण ।
"क्यों है यूं अपने ही वतन में अजनबी- आम आदमी।"
पंक्ति दिल को बेध गई, सोचने पर विवश कर गई ।
और यही हर कविता का मूल है, जिसमे आपका यह प्रयास निश्चित ही सफल हुआ है ।
एक ऐसा यक्ष प्रश्न आपने पूछा है, जिसका प्रत्युत्तर मिलना मुश्किल है।
आभार स्वीकार करें ।
आर्यमनु ।

6:19 अपराह्न


शैलेश भारतवासी said...
आम आदमी की आम बातें विशेष तरीके से। अच्छा लगा पढ़कर

8:01 अपराह्न

Keerti Vaidya ने कहा…

good one...

anitakumar ने कहा…

sajeev ji ....aam aadmi ka itna badhiya chitran .. bahut khoob hai...salaam hai aapki peni drishti ko

shalini ने कहा…

तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों
is sunder oor sachhi rachana ke liye badhai sanjeev ji,

थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता - आम आदमी ।

sahi kaha aap ne kyo ki aam aadmi to befikri se mer bhi nahi sakta oor nahi jee sakta,
per ek bat bataiye sanjeev ji ham sab jo yahan per apne vichar prakat ker rahe hai wo real life me kya itni hi samvedana ke sath aam aadmi ka derd mahsoos ker paate hai nahi ye maine khud dekha hai.

gali me chauraho me
gher me bajaro me
kitne majboor milte hai hame
oor ham prabudh patak, unhe aise hi dekhte hai jaise
gali me pade patther ko