ताज़ा गीत- love Story

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28.1.15

आदत सी हो गयी है...

हादसों की तो अब जैसे, आदत सी हो गयी है,
रोज कुछ बुरा सुनने की, रवायत सी हो गयी है,

कॉफी टेबलों पर मुद्दों का अकाल है जो अमन है,
कोई सनसनी नहीं जेहन में, आफत सी गयी है,

तंत्र मन्त्र चमत्कारों से, पका रहा था मीडिया,
दो चार बम फटे शहर में, राहत सी हो गयी है,

रटे रटाए शब्द फिर वही आ रहे आलाकमानों से,
कड़े शब्दों में निंदा कर दी, रहमत सी हो गयी है,

हमदर्दी का अभिनय करते, घूमते दिखे चैनल वाले,
ब्रेकिंग न्यूज़ है आज धमाका, बरकत सी गयी है,

कुंठाएँ इतनी कि शराब शबाब सब हुए हैं बेअसर,
रस वीभत्स दिखे हर तरफ, नीयत सी हो गयी है,

आम लोग महफूज़ नहीं, सड़कों घरों बाजारों में भी,
हिफाज़त कैदखानों सरीखी, लज्जत सी हो गयी है, 

उफ्फ ये किस बेदिली के दौर में जी रहा है "सजीव",
दिल फटता नहीं किसी दर्द से, आदत सी हो गयी है,

2.1.15

नए साल पर -२



किसी अजाने कमरे में आँख खुली हो जैसे
किसी ने खिड़की के परदे खोल दिए हों जैसे
पर मौसम कैसा होगा कहना मुश्किल है अभी
गुनगुनी धूप होगी या सांवली घटा क्या पता
घनी धुंध है अभी बाहर
छंटेगी धीमे धीमे तो बता पाउँगा
क्या क्या छुपा है इन नज़ारों में
मेरी आँखों के लिए....
कभी सोचा है तुमने कि नया साल
हमेशा जाड़ों में ही क्यों आता है ?

3.8.14

ए दोस्त

आज भी इतने करीब है तू
कि महसूस कर सकता हूँ हर सिम्त तुझे
आज भी यकीन है मुझे
कि दौड़ा चला आएगा तू
मेरी बस एक पुकार पर
गर ठोकर खाऊंगा
तो गिरने से पहले ही तू 
मुझे थाम लेगा बढ़ कर
आज भी इतने करीब है तू कि 
वो सब बातें जो
कह नहीं पाता किसी से
बस तुझी को बता पाता हूँ मैं
कुछ मर्म जो छुपता हूँ
अक्सर खूद से भी
बस तुझी से छुपा नहीं पाता हूँ मैं

पर कभी जब हुआ करता था तू
कहीं बादलों के पार तब
मेरी आँखों में हर पल बसा करता था
बेमतलब बहते आंसुओं में
बेवजह की उन मुस्कुराहटों में
तू बरबस ही मुझे मिलता था
तब जब कुछ था ही नहीं छुपाने को
बातें कितनी होती थी बतियाने को
तब तुझे पुकारने की भी
क्या दरकार थी मुझे
जब गिरने देता था तू मुझे
चोट खाने देता था तब
जब तू कहाँ था मुझसे
रत्ती भर भी तो मुक्त्तलिफ

आ दोस्त चल लौट चलें
फिर उसी मासूमियत को
जहाँ तोतले अल्फाज़ हों
और उजले ज़ज्बात हों
जहाँ तेरी मेरी दोस्ती हो
और दरमियाँ
न दुनिया का टोना टोटका हो
न समझ की गुफाएं हों
न गुरूर का घोंसला हो.....

21.4.13

डर लग रहा है बहुत...


एक चीख उठी तो होगी,
उन पत्थरों से टकरा कर,
तुमने नहीं सुनी...क्यों ????

भाई...बाहर ट्रेफिक का शोर बहुत था,
शादियों के बैंड बाजे कान फोडू थे,
उधर टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ में,
कल रात शहर में हुए डबल मर्डर पर,
तीखी बहस चल रही थी,
बच्चे आई पी एल के चौके छक्कों में मस्त थे,

और फिर लाईफ के झमेले तो आप जानते ही हैं,
दफ्तर की टेंशन, घर की टेंशन,
फुर्सत ही कहाँ है ?
परसों तो भूकंप भी आया था दिल्ली में,
वो तक पता नहीं चला,
फिर ये तो एक बच्ची की चीख भर थी,
भला क्या सुनाई देती कहो....

हाँ कल रात सपने में जरूर देखी थी मैंने,
खून से सनी एक हेयर आयल की बोतल,
पता नहीं क्यों, उसे देखने के बाद,
बैचैन हो गया था मैं बहुत,
सो भी नहीं पाया था ठीक से,
बगल में सोयी मेरी नन्हीं सी जान,
सुकूँ से सोती रही मगर....

सच कहूँ भाई....जीवन में पहली बार,
डर लग रहा है बहुत....


22.11.12

विश्वास का गर्भपात

भ्रमित, शंकित सा मन,
चितित, कुंठित सा कुछ,
माथे पे शिकन की काली लकीरें पड़ती है,
वहम की परछाईयाँ पांव जोड़े चलती है,
विस्मृत से हो जाते हैं समय के सन्दर्भ सब,
दलीलों को काटती दलीलें,
कुछ और भी नुकीली हो जाती है जब,
निर्णय किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाता,
और अनिर्णय ही निर्मम फैसले सुनाता है तब,

प्रसव पीड़ा से भी अधिक असहनीय,
था संदेह का अग्निविष पीना,
कटीले शब्दों की चोट से,
दम तोड़ता एक रिश्ता,
लहूलुहान हो गयी थी कोख,
जब गर्भ में ही हो गया था,
विश्वास का गर्भपात....  

अकस्मिक तो हरगिज नहीं था


चाह का जूनून में बदल जाना,
अकस्मिक तो हरगिज नहीं था.

अपूर्ण आकांक्षाओं ने तलाशा था उसे,
संचित पीडाओं ने तराशा था उसे,
सिन्दूरी शाम का अमावस्या में ढल जाना,
अकस्मिक तो हरगिज नहीं था.

कोई अतृप्त प्यास कहीं रही होगी,
किसी मनहूस मरीचिका में बही होगी,
तृष्णा का यूँ वितृष्णा से निकल आना,
अकस्मिक तो हरगिज नहीं था.

कोई कुंठा का नाग डस कर गुजरा होगा,
किसी निराशा का जहर नसों में पसरा होगा,
सुगबुगाहटों का यूँ चीत्कारों से छिल जाना,
अकस्मिक तो हरगिज नहीं था.