सदियों से बह रहा हूँ किसी नदी की तरह......
जिन्दगी - मिली है कभी
किसी घाट पर,
तो किसी किनारे
कभी रुका हूँ पल दो पल,
जिस्म बन कर आकाश में उडा हूँ कभी,
तो कभी जमी पर ओंधे मूह पडे देखता हूँ - अपनी रूह को,
कभी किसी बूढे पेड की शाखों से लिपटा मिलता है,
तो कभी अनजानी आँखों में, अजनबी चेहरों में,कुछ दूढ्ता सा है,
कभी किसी मज़ार पर सजदे करता है,
तो कभी किसी पुराने मंदिर की सीढियों पर,पहरों बैठा मिलता है,
उलझी कडियों के परे ,
मैं देखता हूँ अक्सर,
एक छोटी सी बोतल,
जिसमे क़ैद है - एक देवता और एक शैतान,
जो बिना एक हुए बोतल से बाहर नही आ सकते,
एक होकर दोनो क़ैद से तो छूटते हैं,
पर लड़कर फिर अलग हो जाते हैं,
और अलग होकर वापस बोतल में सिमट जाते हैं,
याद नही ठीक से ,
वक़्त दोहरा चुका है ,
कितनी बार यह खेल,
दोहारायेगा अभी और कितनी बार,
कौन जाने,
सदियों से बह रहा हूँ किसी नदी की तरह......
हम मिलते रहे,
रोज मिलते रहे,
तुमने अपने चहरे के दाग,
घूँघट में छुपा रखे थे,
मैंने भी सब जख्म अपने ,
कपड़ों से ढांप रखे थे,
मगर हम मिलते रहे- रोज नए चहरे लेकर,
रोज नए जिस्म लेकर ।
आज - तुम्हरे चहरे पर पर्दा नही,
आज- मेरा जिस्म भी बेपर्दा है,
आज- हम और तुम हैं, जैसे दो अजनबी ।
दरअसल , हम मिले ही नही थे अब तक,
देखा ही नही था कभी,
एक दूसरे का सच ।
आज मगर कितना सुन्दर है - मिलन
आज -जब मैंने चूम लिए तुम्हारे चहरे के दाग,
और आज - तुमने भी तो रख दी है,
मेरे जख्मों पर,- अपने होंठों की मरहम ।
लफ्ज़ रूखे, स्वर अधूरे उसके,
सहमी सी है आवाज़ भी,
सिक्कों की झंकारें सुनता है,
सूना है दिल का साज़ भी,
तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता - आम आदमी ।
मौन दर्शी हर बात का ,
धूप का बरसात का,
आ जाता बहकाओं में ,
खो जाता अफवाहों में,
मिलावटी हवाओं में,
सडकों में फुटपाथों में,
मिल जाता है अक्सर कतारों में,
राशन की दुकानों में,
दिख जाता है अक्सर,
अपनी बारी का इंतज़ार करता -
दफ्तरों -अस्पतालों के बरामदों में ,
क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी -
आम आदमी ।