सिंहासन सजाओ,
विजय गीत गाओ,
कि एक बार फिर बिठा दिया है,
जनता जनार्धन ने,
उसे तख्ते-ताउस पर,
जो सरे-आम कहता है कि -
"हाँ मैंने हत्याएं करवाई हैं,
बिगाड़ लो क्या बिगाड़ सकते हो मेरा",
आज ताज पोशी है उसकी,
जो भरे-बाज़ार में सीना ठोक कर
कहता है -
हाँ मैंने घोम्पी है
हामलाओं के पेट में तलवारें,
हाँ मैंने कलम किये हैं,
मासूमों के धड़ से सर,
हलाल किये मजहब के नाम कर कितने,
नफरत के तंदूर में मैंने,
सेंकी है राजनीति की रोटियां,
भेड़चाल के इस देश में अब,
खूब फैलेगी "मुखौटो" की जादूगरी,
खडे हो जायेंगे जाने कितने,
कुर्तानुमा कट शर्ट पहने,
हिटलर नुमा नेता,
अनाप शनाप चुनावी बयानों को,
राजनीती का साहित्य माना जाएगा अब,
एन्कोउन्टर विशेषज्ञ पूजे जायेंगे,
सिंहासन सजाओ,
विजय गीत गाओ,
लोकतंत्र के अखाडे का,
ये खेल भी क्लासिक है।
धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए,
आज का दिन एतिहासिक है।