ताज़ा गीत- love Story

23.5.07

जीवन की शाम

बलवंत सिंह जी मुझे हमेशा याद रहेंगे। अपने एक मित्र के साथ एक वृत्तचित्र के फिल्माकन के सिलसिले मे जाना हुआ था , जमुना पार स्थित उस वृधाश्रम में जहाँ मिले थे बलवंत जी - पूरी जिन्दगी उन्होने बिताई अपने दोनों बच्चों को इस लायक बनाने में ताकी वो अपने पैरों पर खडे हो सकें , बिना किसी के सहारे के, बच्चे जब बडे हुए तो बस गए सात समुन्दर पार जाके, और छोड गए अपने बूढे माँ बाप को इस व्रदाश्रम में , अपने बुदापे से जूझने को .... दो साल पहले बलवंत सिंह जी की पत्नी भी उन्हें छोड कर चली गयी हमेशा के लिए इस संसार को अलविदा कहकर, अब बलवंत सिंह बिल्कुल अकेले हैं.... शायद उन्ही के दिल की तड़प है मेरी कलम से निकली इन पक्तियों में ....



ये डूबता सूरज ,
ये सूखे पत्ते ,
मुझे एहसास दिलाते है पल पल,
कि मैं भी
डूब रहा हूँ,
कि मैं भी,
सूख रहा हूँ,

ये झुका बदन , ये सूखापन ,
मुझे अच्छा नही लगता,
ये बुझा मन , ये सूनापन ,
मुझे अच्छा नही लगता ।

खाली खाली कमरे ,
लम्हे बीते गुजरे ,
चश्मे के शीशों से झांकते,
चेहरे की झुर्रीयों से कांपते ,

ये चेहरा, ये दर्पण,
मुझे अच्छा नही लगता,
ये कमरा, ये आंगन,
मुझे अच्छा नही लगता ।

17.5.07

लगन

मेरे सपनों के पौधे ,
विशाल क्षितिज के नीचे,
बड़ते चले जाते हैं,
बेख़ौफ़,
अपनी सीमाओं से परे,
विशाल क्षितिज के नीचे ।

और आशाओं का अथाह , अनंत ,
समुन्दर ,
आँखों में उमड़ने लगता है,
उम्मीदों के प्रवासी पंछी,
लौट आते हैं -
फिर अपने घरौंधों में,
शाखों से हरियाली बरसती है ।

सभी बंधनों , सभी दायरों ,
को तोड़कर ,
उड़ने की प्यास व्याकुल करती है ,
फिर जब तपती हुई रेत नर्म पड़ती है,
और सूरज अंधेरों में समां जाता है तो,
एक नयी सुबह की तलाश में ,
मन पागल भटकता है,
विशाल क्षितिज के नीचे ।

13.5.07

माँ

' माँ दिवस ' के उपलक्ष्य पर संसार की समस्त माँओं को सप्रेम समर्पित है ये कविता

"माँ"
कितना छोटा मगर
कितना महान है ये लफ्ज़

इस लफ्ज़ में छुपी हैं
वो दो ऑंखें,
जो देखती हैं हमे हर पल,
जिनके सपनो में बसें है
हमीं पल पल ।

इस लफ्ज़ में छुपे हैं
दो हाथ ,
जिन्होंने थाम कर उंगली
चलना सिखाया,
भूख लगी जब निवाला खिलाया,
जब गिरे हम तो बढ कर उठाया,
रातों को थपथपाकर सुलाया,

इस लफ्ज़ में छुपा है बचपन,
ममता का आंगन,
निस्वार्थ प्रेम का दर्पण -
माँ ही तो है,
पूजा का दीप पावन -
माँ ही तो है।

बदनसीब हैं वो जिनसे ये दूर हुईं ,
पर उनकी किस्मत हाय
जो इनसे हुए पराये ।

8.5.07

सिरफिरा है वक़्त

उदासी की नर्म दस्तक ,
होती है दिल पे हर शाम ,
और गम की गहरी परछाईयाँ ,
तनहाईयों का हाथ थामे ,
चली आती है -
किसी की भीगी याद ,
आखों मे आती है ,
अश्कों मे बिखर जाती है ।

दर्द की कलियाँ
समेट लेटा हूँ मैं ,
अश्कों के मोती
सहेज के रख लेता हूँ मैं ...


जाने कब वो लौट आये .....

वो ठंडी चुभन ,
वो भीनी खुश्बू ,
अधखुली धुली पलकों का
नर्म नशीला जादू ,
तस्सवुर की सुर्ख किरणें ,
चन्द लम्हों को जैसे ,
डूबते हुए सूरज में समां जाती है ,
शाम के बुझते दीयों में ,
एक चमक सी उभर आती है ,

टूटे हुए लम्हे बटोर लेता हूँ मैं ,
बुझती हुई चमक बचा लेता हूँ मैं ,

जाने कब वो लौट आये ......

सरफिरा है वक़्त,
कभी कभी लौट भी आता है ,

दोहराने - आपने आप को ।

2.5.07

एक ग़ज़ल और तुम

दस साल बीत गए , याद है क्या तुम्हे , सहारनपुर कि वो सर्दियाँ , दोपहर को जब धूप गुनगुनी आंगनमे आती थी , तुम भी चली आती थी । बैठे रहते थे हम पहरों युहीं चुप चाप खामोश , मगर कितनीसारी बातें हो जाती थी और समय जाने कैसे गुजर जाता था ..... समय तो अब बहुत आगे निकल चूका है ... मगर वो पल आज भी महकते हैं मेरी यादों में .... इस ग़ज़ल की तरह ....


ये खामोशी ये झुकी नज़र

वक़्त जैसे गया ठहर


चेहरे पर ये धूप जैसे

करवटें लेता पहर


खेतों की पहली फसल सी

खिलती ये कमसिन उमर


तेरी खुश्बू से खिले हैं

फूल हर राहे - गुजर


हाल तेरा पूछे मुझसे

रास्ते का हर शजर


आसमान तुम सा मिला तो

बस गया दिल का शहर


बेखुदी ही बेखुदी है

रात दिन शामों सहर


जागती आँखों में चलता

ख्वाब सा है ये सफ़र


साथ मेरे तुम चलो तो

है किनारा हर लहर